लोकतंत्र

© Rajeev Dubey (All rights reserved)

44 Posts

673 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3672 postid : 468

सूरज खींच लाते हैं चलो

Posted On: 31 Oct, 2011 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

TheSun













जिंदगी तूफानों में जब फँस ही गई

धूल आँखों में जब भर ही गई

तब ढलती सांझ से रुकने की मिन्नत क्या करें

अंधेरे को पी कर, सूरज खींच लाते हैं चलो ।

वक्त बुरा है हम जानते हैं

साथी कम हो चले हैं यह भी पहचानते हैं

हवाओं में सर्द खामोशी हो तो हो

बर्फ फिर भी  पिघलेगी, इतनी आग तो दिल में है अभी भी ।

सन्नाटे बढ़ते रहे हैं बरसों से

दरवाजे पर आहट होती कभी-कभी

क्या हुआ, जो कोई पूछता नहीं हाल दिल का

अकेले ही हँस लेने की हिम्मत बाकी है अभी भी।

तुम देखना एक दिन ऐसा भी आयेगा…

मिलने वाला हर चेहरा मुस्कुराएगा

ज़ोर लगा दिया है हमने इतना…

खरीद लेंगे हम, गम सारे जमाने के ।



Tags:         

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

26 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 9, 2011

खूबसूरत कविता……… बधाई…..

    rajeev dubey के द्वारा
    November 14, 2011

    धन्यवाद पियूष जी, एक लम्बे अरसे के बाद आपसे संपर्क का सूत्र जुड़ा…

priyasingh के द्वारा
November 2, 2011

“क्या हुआ जो कोई पूछता नही हाल दिल का अकेले ही हंस लेने की हिम्मत बाकि है अभी भी”……………………. अर्थपूर्ण रचना ……….. शीर्षक तो बहुत खूब रचा आपने ………सूरज खिंच लाते है चलो ………..

    rajeevdubey के द्वारा
    November 2, 2011

    प्रिया जी, सही कहा आपने, शीर्षक उभर कर आया है… आपकी रचनाओं के शीर्षक भी बड़े प्यारे होते हैं… आभार प्रतिक्रिया के लिए…

आर.एन. शाही के द्वारा
November 2, 2011

हमेशा की तरह आपकी एक ओजस्वी कविता । कल छठ व्रतियों ने सूर्य को सामूहिक प्रयास से खींच ही लिया । सुबह पुन: पुनरावृत्ति हो रही है … आभार !

    rajeevdubey के द्वारा
    November 2, 2011

    शाही जी, नमस्कार . एक अनूठा संयोग रहा कि यह कविता सूर्य देव से जुड़े पर्व की पूर्व संध्या पर ही रची गयी… अनुकम्पा उनकी, आभार

roshni के द्वारा
November 1, 2011

राजीव जी नमस्कार बहुत बढ़िया सुंदर रचना

    rajeevdubey के द्वारा
    November 1, 2011

    रोशनी जी, आभार…

rajkamal के द्वारा
November 1, 2011

आदरणीय राजीव जी ….. सादर प्रणाम ! पीकर सारे जमाने का गम रूपी हलाहल उसको कण्ठस्थ तुम कर लेना लेकिन उदरस्थ नहीं , क्योंकि चाँद तो बस एक ही है ! न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    rajeevdubey के द्वारा
    November 1, 2011

    अहो राजकमल जी, कितना हर्ष हुआ आपकी प्रतिक्रिया देखकर … ! किसी अपने से बहुत दिनों बाद यूं ही मुलाक़ात हो जाये जैसे. आभार .

abodhbaalak के द्वारा
November 1, 2011

सुन्दर रचना राजीव जी गढ़ और पढ़ दोनों में ही आप……………. मंच की शोबा बढाते रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    rajeevdubey के द्वारा
    November 1, 2011

    अबोध जी, आभार… आपकी अपनेपन से भरी प्रतिक्रियाएं मन प्रसन्न कर देती हैं.

nishamittal के द्वारा
November 1, 2011

आदरनीय दुबे जी आपकी विद्वत्ता आपकी रचना में विद्यमान है.बहुत प्रेरक पंक्तियाँ.

    rajeevdubey के द्वारा
    November 1, 2011

    निशा जी, हार्दिक आभार, शब्द यदि ह्रदय की बात कह जाएँ तो सार्थक हैं… और यदि बात प्रेरणादायक भी हो तो मेरे नहीं, ह्रदय में विराजने वाले परमेश्वर की प्रेरणा हैं , मैं तो निमित्तमात्र हूँ.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
November 1, 2011

आदरणीय राजीव जी, अत्यंत ही आशावादी एवं प्रेरणास्पद पंक्तियाँ। अटल जी की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं - हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा। सादर एवं साभार,

    rajeevdubey के द्वारा
    November 1, 2011

    अटल जी की ही यह पंक्तियाँ भी यादगार हैं “दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते । टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते । ” …. हार्दिक आभार आपका वाहिद जी .

Santosh Kumar के द्वारा
November 1, 2011

आदरणीय राजीव जी ,..बहुत प्रेरक रचना ,..हार्दिक साधुवाद

    rajeevdubey के द्वारा
    November 1, 2011

    संतोष जी, आभार… रचना प्रेरणादायक लगी यह बात ह्रदय को प्रसन्न कर गयी .

Dr. SHASHIBHUSHAN के द्वारा
November 1, 2011

सूरज  भी  खींच के  लायेंगे, अँधियारे को पी जायेंगे । आयेगा एक दिन ऐसा भी, सब मानव खुशी मनायेंगे। हिम्मत है अभी बहुत बाकी……………

    rajeevdubey के द्वारा
    November 1, 2011

    डॉ. शशिभूषण जी, प्रतिक्रिया पर बहुत आभार…

sadhana thakur के द्वारा
November 1, 2011

राजीव जी ,अच्छी लगी आपकी रचना ,बधाई ..

    rajeevdubey के द्वारा
    November 1, 2011

    साधना जी, प्रतिक्रिया पर आभार…

sumandubey के द्वारा
October 31, 2011

सुन्रादर जी नमस्कार सुन्दर ,पक्तियां ——————————————————————– सन्नाटे बढ़ते रहे हैं बरसों से दरवाजे पर आहट होती कभी-कभी क्या हुआ, जो कोई पूछता नहीं हाल दिल का अकेले ही हँस लेने की हिम्मत बाकी है अभी भी।

    rajeev dubey के द्वारा
    October 31, 2011

    सुमन जी, रचना पसंद आई यह जान कर प्रसन्नता हुई, आभार

Harish Bhatt के द्वारा
October 31, 2011

राजीव जी सादर प्रणाम. बहुत ही शानदार कविता के लिए हार्दिक बधाई. जिंदगी तूफानों में जब फंस ही गई धूल आँखों में जब भर ही गई तब ढलती सांझ से रुकने की मिन्नत क्या करें अंधेरे को पी कर, सूरज खींच लाते हैं चलो ।

    rajeev dubey के द्वारा
    October 31, 2011

    हरीश जी, प्रतिक्रिया पर हार्दिक आभार….


topic of the week



latest from jagran