लोकतंत्र

© Rajeev Dubey (All rights reserved)

44 Posts

673 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3672 postid : 403

स्वर अभी भी गूंजते हैं...

Posted On: 13 Aug, 2011 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

स्वर अभी भी गूँजते हैं ।

 

फूटे थे कोमल अधरों से बन कर राग

आग्रही प्रेम के गीतों में ढल

स्वप्नों के रंगों से रंजित मोह जाल

निशा निमंत्रण बन कर गूँजे थे।

 

वे घृणित हुए थे दंभ भरे

समझे थे नश्वर को सत्य

अपमान भरे विष प्यालों से

बेध कोई हृदय निकले थे ।

 

असीम वेदना के भी वाहक

रुक रुक कर करुण पुकार बने

वे आर्द्र थे उस संध्या को

लगते थे स्वयं में डूबे ।

 

आज भी इतने समय बाद

और भी अनगिन रूपों में

उल्लसित, शांत, करुण, …

वे स्वर अभी भी गूँजते हैं…!

| NEXT



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 2.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran