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जनविद्रोह जगा डाला...

Posted On: 14 Mar, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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यह तुमने क्या कर डाला …?

विश्वास हमारा था तुम पर

पर तुमने चालें चल-चल कर

हमको ही छल डाला !

 

ओ शासक !

हमने तुमको मंदिर में बैठाया

माना फल दुआ का

लेकिन तुमने, सब निष्फल कर डाला !

 

अब देखो …

वे लिए मशालें आते हैं -

हुंकारों से, आकाश गुंजाते हैं

तुमने जनविद्रोह जगा डाला !

 

क्या कह कर तुम माफी मँगोगे

कितनों के आँसू पोंछोगे

तुमने तो मीठे तालाबों को

खारा-खारा कर डाला ।

 

यह चमन हमारा अपना था

उजड़ा-उजड़ा अब दिखता  है

तुमने तो अपनी ही मिट्टी में

विष का बीज  लगा डाला ।

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29 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 19, 2011

आदरणीय राजीव जी …..पैरीपैना ! लता दीदी की एक पैरौडी प्रस्तुत है :- तुम्हे और क्या दूँ मैं बधाई के \”सिवाय\” कि तुमको हमारी \”नजर\” लग जाए ….. इस राज्कम्लिया हरकत को सहन कर लीजियेगा कहीं गुस्से में डिलीट मत कर देना ….. होली कि पिचकारी भर -२ के शुभकामनाये

    rajeev dubey के द्वारा
    March 20, 2011

    राजकमल जी, होली पर आपको ढेरों शुभकामनाएं

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 16, 2011

आदरणीय राजीव जी, देश में स्वतंत्रता के समय जो वायदे हमसे किये गए थे उनमे से कितने पूरे हुए हर सच्चा हिन्दुस्तानी जानता है.. आपने जो अलख जगाई है वो प्रज्ज्वलित रहेगी….

    rajeev dubey के द्वारा
    March 16, 2011

    वाहिद जी, आभार…जरूर, हम जरूर आगे बढ़ेंगे

March 15, 2011

…..विश्वास हमारा था तुम पर पर तुमने चालें चल-चल कर हमको ही छल डाला !…….. राजीव जी सुन्दर पंक्तियाँ.

    rajeev dubey के द्वारा
    March 16, 2011

    राजेंद्र जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार…

राहुल द्विवेदी के द्वारा
March 15, 2011

नीरज का एक शेर याद आ गया गैर चिरागों कि हिफाज़त फिर उन्हें सौपी गयी रोशनी मर जाएगी खाली धुआं रह जाएगा राजीव जी एक शानदार कविता के लिए बधाई

    rajeev dubey के द्वारा
    March 15, 2011

    राहुल जी, यह कैसी अजीब बात हो गयी, देश तो आजाद हो गया पर आज़ादी गुलाम हो गयी… हमें आपस में लड़ा और बाँट कर एक ऐसी चाल चल दी गयी की छह दशक से ऊपर हो गए और देश के लोग अभी भी इस कदर अव्यवस्था, पुलिस-राज, भ्रष्टाचार, … को सहने के लिए मजबूर हैं… प्रतिक्रिया के लिए आभार

Nikhil के द्वारा
March 15, 2011

एक उत्कृष्ट रचना राजीव जी. बधाई.

    rajeev dubey के द्वारा
    March 15, 2011

    निखिल जी, नाज़ है मुझे देश की युवा शक्ति पर… परिवर्तन हो कर रहेगा…आभार

allrounder के द्वारा
March 15, 2011

राजीव जी, लोकतंत्र मैं जनता के साथ हो रहे अन्याय के लिए सरकार के विरुद्ध आवाज उठाती शानदार रचना पर हार्दिक बधाई ! ऐसी सरकार के लिए हमने भी एक नारा बना डाला जनता ने जिस सरकार को 5 वर्ष के लिए बिठा डाला जनता जाए भाड़ मैं नेताओं की लाइफ है झींगालाला

    rajeev dubey के द्वारा
    March 15, 2011

    हाँ सचिन जी, इन लोगों ने तो व्यवहार ही ऐसा किया है… आपका नारा अच्छा है…आभार

Harish Bhatt के द्वारा
March 15, 2011

राजीव जी सादर प्रणाम, बहुत ही बेहतरीन कविता के लिए हार्दिक बधाई. यह चमन हमारा अपना था उजड़ा-उजड़ा अब दिखता है तुमने तो अपनी ही मिट्टी में विष का बीज लगा डाला ।

    rajeev dubey के द्वारा
    March 15, 2011

    हरीश जी, बहुत बहुत आभार प्रतिक्रिया के लिए. देश की एक बड़ी आबादी बेहाल है, बड़ा दुःख होता है, इतने दशक गुज़र गए. इस बीच दुनिया कहाँ से कहाँ बढ़ती जा रही है और हमारे लोग अभी भी रोटी, पानी, बिज़ली के लिए तरस रहे हैं…! और फिर ऊपर से यह भ्रष्ट व्यवहार, जोड़-तोड़ के खेल, …

आर.एन. शाही के द्वारा
March 15, 2011

दुबे जी, रचना जी ठीक कहती हैं । क्रांति के अलख में दीन भाव उचित नहीं । ओजस्विता ही झलकनी चाहिये । बधाई ।

    rajeev dubey के द्वारा
    March 15, 2011

    शाही जी, आपका मत सही है… …………………………………………….. वे लिए मशालें आते हैं – हुंकारों से, आकाश गुंजाते हैं …………………………………………….. बहुत बहुत आभार…

rachna varma के द्वारा
March 15, 2011

राजीव जी नमस्कार , ये जनता के सेवक है , इन्हें भगवान मत बनाइये दिखाइए अपनी ताकत , इन्हें जमीं पर लाइए | अपने मत का सही प्रयोग करके ही इस देश की किस्मत बदली जा सकती है एक बढ़िया आलेख , धन्यवाद |

दीपक पाण्डेय के द्वारा
March 15, 2011

राजीव जी , बहुत ही बेहतरीन अवम यथार्थपरक कविता.

    Rajeev Dubey के द्वारा
    March 15, 2011

    दीपक जी, आपको हार्दिक आभार… सहयोग लगेगा इस परिस्थिति को बदलने में …

aftab azmat के द्वारा
March 15, 2011

दुबे जी नमस्कार, आज के परिदार्श्ये पर बहुत सुन्दर रचना…बधाई…

    Rajeev Dubey के द्वारा
    March 15, 2011

    आफताब जी, प्रतिक्रिया पर आभार, अब यह लड़ाई शुरू की है तो हर मोर्चे पर फैलेगी…

alkargupta1 के द्वारा
March 15, 2011

दुबे जी , यथार्थ के धरातल पर गंभीर भावों से युक्त सशक्त रहना !

    alkargupta1 के द्वारा
    March 15, 2011

    कृपया रहना को ‘ रचना ‘ पढ़ें

    rajeev dubey के द्वारा
    March 15, 2011

    अलका जी, प्रतिक्रिया पर आभार…

vinitashukla के द्वारा
March 14, 2011

असफल नेतृत्व को, कटघरे में खड़ा करने वाली, सार्थक और अर्थपूर्ण कविता.

    rajeev dubey के द्वारा
    March 15, 2011

    विनीता जी, इस स्तर पर इतने लम्बे समय तक गलतियां, इतना भ्रष्ट व्यवहार, और जोड़ तोड़ की राजनीति देश के लिए बहुत नुकसानदेह साबित हुई है, प्रतिक्रिया पर आभार

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 14, 2011

priy rajiv ji ….nmskaar ! पहले माफ़ी नहीं मांगते थे तब शिकायत थी (1984 – 2004) और अब जब माफ़ी पर माफ़ी मांगी जा रही है तब भी शिकायत पर शिकायत …. वाह ! क्या बात है ….

    rajeev dubey के द्वारा
    March 15, 2011

    चिड़िया चुग गयी खेत …. ……………………………… राजकमल जी, प्रतिक्रिया पर आभार


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