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उठ जाओ तुम (महिला दिवस पर विशेष प्रस्तुति)

Posted On: 8 Mar, 2011 में

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तुमको क्या डर है

तुम तो खींच दो बस

धागे बैठे-बैठे …

ज़िंदगी बदल देगी रास्ते – यही  सच है ।

 

तुम्हारी एक मुस्कान को

तरसते वो भी जो सरकार कहलाते

तुम जो उठ के चल दो

तो भूचाल हो जाए ।

 

यूँ ही सौंप रखी तुमने

जागीर अपनी

ये मर्द क्या चीज़ हैं

क्या है मजाल इनकी !

 

इस जहाँ में ऐसा क्या

जो लगे अच्छा तुम्हारे बिना…

उलट जाये ये सृष्टि

जो तुम्हारी भृकुटि हो जाये तिरछी !

 

नारी तुम हार गई  कई बार

लड़ाई इसलिए क्योंकि

तुम्हें खेलने का मज़ा चाहिए

नहीं तो जीत तुम्हारी कब की होती !

 

पर अब शायद इस खेल में

लगे सोचने कई अन्यथा

तुम थोड़ा पलट दो बाज़ी

व्यवस्था हस्तक्षेप चाहती है ।

 

रूप में बेटी के तुम ज़रा

दिखा दो कि सहारा तुम ही हो घर का,

खड़ी  हो जाओ संसार में अन्याय के विरुद्ध

दिखा दो रूप चंडिका !

 

उठ जाओ तुम

लड़ जाओ तुम …

परिवर्तन की इस बेला में

न कहे कोई कि तुम हारी !

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32 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rachna Varma के द्वारा
March 10, 2011

राजीव जी नमस्कार , महिला दिवस पर शक्ति के इस आह्वान पर आपको बधाई मगर उसे आगे बढ़ने से रोकने का काम कौन कर रहा है क्या स्वयं नारी ? ,गर्व भाव में डूबा हुआ पुरुष ?समाज या फिर हालात? आखिर कौन जिम्मेदार है नारी को विकास के रास्ते पर न चलने देने के लिए | एक बेहतरीन कविता !

    rajeev dubey के द्वारा
    March 10, 2011

    रचना जी, बड़े कठिन प्रश्न खड़े कर दिए आपने… मेरे विचार में हमारे राष्ट्रीय मानस पटल पर कुछ विकृतियाँ उभर आयी हैं. यह विकृतियाँ एक बहुत बड़े पुरुष वर्ग को उसकी शारीरिक ताकत के बल पर हिंसक, मौका परस्त और दूसरों के प्रति संवेदनहीन बना देती हैं. यह वर्ग हर दूसरे व्यक्ति को – चाहे वह पुरुष हो या स्त्री – दबाना चाहता है, कब्ज़ा करना चाहता है, भोगना चाहता है. कई बार कई स्त्रियाँ भी स्वयं इसी वर्ग की मानसिकता का हिस्सा बन इस कृत्य में शामिल हो जाती हैं. यह वर्ग लगातार सत्ता और धन पर कब्ज़ा करता जा रहा है , इत्यादि. यह वर्ग नियम क़ानून नहीं मानता, … बिना किसी शर्म के… लगातार अपने से कमज़ोर का शोषण करता हुआ, अपने से कम पैसे वाले का, अपने से कम ताकत वाले का…! इस वर्ग की वजह से पूरा सामाजिक तंत्र एक असुरक्षा से त्रस्त है… और इस असुरक्षा से बचने के लिए अन्य सभी ने ढेरों सीमा रेखाएं खींच ली हैं, जिससे कि वह किसी तरह सुरक्षित जीवन यापन कर सकें, ढेरों रूढ़ियाँ पैदा हो गयी हैं… खुली हवा बंद है. और फिर यह सब कुछ और भी जटिल, पर्त दर पर्त बढ़ता गया है… यह समस्या का एक बड़ा पहलू है, जिस पर विचार कर समाधान खोजने की जरूरत है, निश्चय ही समस्या बड़ी है तो और भी ढेरों पहलू हैं… लेकिन फिर भी एक बात तय है, नारी को यह लड़ाई लड़नी होगी और वह सब पुरुष वर्ग जो इस देश और समाज को नष्ट होने से बचाना चाहते हैं, उन्हें समर्थन करना होगा … । आप भी अपने विचार बताइएगा , आभार सहित.

K M Mishra के द्वारा
March 10, 2011

इस जहाँ में ऐसा क्या जो लगे अच्छा तुम्हारे बिना… उलट जाये ये सृष्टि जो तुम्हारी भृकुटि हो जाये तिरछी ! नारी तुम हार गई कई बार लड़ाई इसलिए क्योंकि तुम्हें खेलने का मज़ा चाहिए नहीं तो जीत तुम्हारी कब की होती राजीव जी सादर प्रणाम । नारी को उसकी संपूर्ण शक्तियों के बारे चेताती बहुत खूबसूरत कविता के लिये आभारी हूं ।

    rajeev dubey के द्वारा
    March 10, 2011

    मिश्रा जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार… उम्मीद है कि रास्ते सुरक्षित और नज़रें शालीन बनेंगी…

Ramesh bajpai के द्वारा
March 10, 2011

दुबे जी ज़िंदगी बदल देगी रास्ते बदलाव की यह गुजारिस अनुकरणीय है | बधाई

    rajeev dubey के द्वारा
    March 10, 2011

    बाजपेयी जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार…

sdvajpayee के द्वारा
March 9, 2011

  राजीव जी,  नमष्‍कार ।  अच्‍छा आह्वान है।  वैसे, बदलाव के इस आह्वान से पुरुष को प्रेरित होने की अधि‍क आवश्‍यकता है। पुरुष -मानसिकता में अपेक्षित बदलाव होने पर ”उठ जाओ तुम लड़ जाओ तुम …” की शायद आवश्‍यकता ही न रह जाए।

    rajeev dubey के द्वारा
    March 9, 2011

    बाजपेयी जी, प्रतिक्रिया पर बहुत बहुत आभार… लेकिन हमारे जिद्दी पुरुष ऐसे ही कहाँ मानने वाले हैं…! थोड़ी तो लडाई करनी ही पड़ेगी…भले ही सांकेतिक… और कहीं कहीं पर जोरदार भी

    sdvajpayee के द्वारा
    March 9, 2011

     राजीव जी , कर्नल गद्दाफी समय की मांग को पहचान स्‍वयं परिवर्तन के पक्षधर बन जाएं तो यह अधिक श्रेयस्‍कर स्थिति होगी। विपक्ष तो समर्थ- सक्षम और समझदार है ही।

दीपक पाण्डेय के द्वारा
March 9, 2011

राजीव जी, एक अनुकरणीय कविता. बहुत अच्छी लगी .

    rajeev dubey के द्वारा
    March 9, 2011

    दीपक जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार…आगे भी प्रयास करूँगा कि आप सब को पसंद आयें ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत करूँ…

allrounder के द्वारा
March 9, 2011

राजीव जी, महिला दिवस पर महिलाओं को उनकी शक्ति का आभास और उन्हें आंदोलित करती अच्छी रचना पर बधाई !

    rajeev dubey के द्वारा
    March 9, 2011

    सचिन जी, हाँ…हमें उनका साथ तो देना ही होगा, इसी में हमारा भी उज्जवल भविष्य है…आभार

vinitashukla के द्वारा
March 9, 2011

नारी को अबला से सबला बनने की प्रेरणा देती हुई सुन्दर कविता. एक शुभ आह्वान.

    rajeev dubey के द्वारा
    March 9, 2011

    विनीता जी, प्रतिक्रया पर आभार एवं ढेरों शुभकामनाएं…

आर.एन. शाही के द्वारा
March 9, 2011

महिला जागरण के सापेक्ष बेहतरीन प्रयास दुबे जी । बधाई ।

    rajeev dubey के द्वारा
    March 9, 2011

    शाही जी, हार्दिक आभार…

div81 के द्वारा
March 9, 2011

राजीव जी, बेहतरीन कविता के लिए आप का आभार आप के आह्वान में एक आवाज मेरी भी शामिल है | अपने नारी रूप में ही आकश कि बुलंदी को छू पाओगी शक्ति रूपेण हो तुम शक्ति रूप में कब आओगी तुम को आजादी का नहीं सम्मान का अधिकार चाहिए नारी कि छदम काया नहीं सशक्त रूप और स्वाभिमान चाहिए

    rajeev dubey के द्वारा
    March 9, 2011

    दिव्या जी, अवश्य अवश्य…नारी का सम्मान…नारी का उत्कर्ष ही इस देश को आगे ले जाएगा ऐसा मेरा दृढ मत है. हम सभी को मिलकर यह संभव करना होगा…

Tripta Thakur के द्वारा
March 9, 2011

wonderful.. Thanks for awakining our soi hoi shakti.. Tripta

    rajeev dubey के द्वारा
    March 9, 2011

    तृप्ता जी, जैसे जैसे आप सबकी स्वयं के अन्दर छुपी शक्ति जागृत होगी वैसे-वैसे इस देश के उत्थान का स्वप्न भी साकार होने लगेगा, यह भी तो आखिर हमारी जननी जन्मभूमि है …

March 9, 2011

उठ जाओ तुम लड़ जाओ तुम … परिवर्तन की इस बेला में न कहे कोई कि तुम हारी ! राजीव जी महिला दिवस पर वाकई सार्थक रचना के लिए हार्दिक शुभकामनाएं.

    rajeevdubey के द्वारा
    March 9, 2011

    राजेंद्र जी, प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार…

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 8, 2011

प्रिय राजीव जी ….नमस्कार ! इस जहाँ में ऐसा क्या जो लगे अच्छा तुम्हारे बिना… मैंने भी इसी विषय पर एक लेख लिखा हुआ है ….शायद कभी पोस्ट करूँ ….. एक मर्द के द्वारा महिलाओं के लिए लिखी गई बहुत ही बेहतरीन कविता के लिए मेरी भी बधाई

    rajeevdubey के द्वारा
    March 9, 2011

    राजकमल जी, बहुत बहुत आभार… जरूर, आपके लेख की प्रतीक्षा रहेगी.

Alka Gupta के द्वारा
March 8, 2011

दुबे जी , नारी के सशक्तिकरण के लिए आह्वान करती हुई सुन्दर कृति !

    rajeevdubey के द्वारा
    March 9, 2011

    अलका जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार.. एवं शुभकामनायें

nishamittal के द्वारा
March 8, 2011

आदरनीय दुबे जी,नारी को सशक्त बनने के लिए आपके आह्वान हेतु धन्यवाद.काश यही मानसिकता स्वयं नारी व समूचे समाज की होती.

    rajeevdubey के द्वारा
    March 8, 2011

    निशा जी, सर्वप्रथम तो इस विशिष्ट दिवस पर आपको एवं मंच की समग्र स्त्री शक्ति को नमन…! शुभकामनाएं ! एक नारी के रूप में आपकी एवं सभी की आकांक्षाएं पूर्ण हों यही कामना है. प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार. परिवर्तन अवश्य आएगा…आइये हम सब मिलकर प्रयत्न करते हैं…

    nishamittal के द्वारा
    March 9, 2011

    दुबे जी कोई भी परिवर्तन सभी के समग्र प्रयासों व इच्छा` शक्ति से ही संभव है.ईश्वर करे समस्त समाज का देश का,मानवजाति का उत्थान हो.धन्यवाद

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 8, 2011

राजीव जी, इतना प्रबल आह्वान …यदि आज कि नारी इसे आत्मसात कर ले तो उसके दिन बहुरते देर नहीं लगेगी|  साभार,

    rajeevdubey के द्वारा
    March 8, 2011

    वाहिद जी, ये तो बस उदगार हैं जो बरबस ही निकल पड़े …. हर ओर विभिन्न रूपों में फ़ैली सृष्टि की उस सत्ता के लिए जो हमारी बहुत अपनी है…और जिसके हम अपने हैं !


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