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मृत्यु

Posted On: 6 Mar, 2011 में

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मृत्यु की अनजान गहराईयों में

खो जाते हैं सभी एक दिन ।

 

रह जाती हैं यादें – मुठ्ठी भर

और स्वप्नों की राख़ उड़ती फिरती है ।

 

आँसू बन कुछ हृदय पिघल जाते हैं

कुछ सिसकारियाँ चारों ओर फैल जाती हैं ।

 

हर ओर सजती हैं सहमी अर्थियाँ

फिर भी जीवन के पल लंबे लगते हैं !

 

न जाने कहाँ खो जाते हैं जाने वाले …

ये प्रश्न हमेशा अनुत्तरित ही रह जाते हैं !

 

इन गहरी निद्राओं के पार क्या है ?

पल भर सोच सब आगे बढ़ जाते हैं !

 

सब छायाएँ हैं – या कि सत्य कोई

अभी कल थे सभी, न आज कोई ।

 

जीवन रहस्यमय कुहासा तो मृत्यु अनजान अंधेरा

सब स्वयं ही इनमें गुम होते जाते हैं !

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25 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 8, 2011

राजीव जी, जीवन के शाश्वत सत्य को प्रतिबिंबित करती यह सार्थक कविता बहुत पसंद आई| साभार,

kmmishra के द्वारा
March 8, 2011

हर ओर सजती हैं सहमी अर्थियाँ फिर भी जीवन के पल लंबे लगते हैं ! इन गहरी निद्राओं के पार क्या है ? पल भर सोच सब आगे बढ़ जाते हैं ! सब छायाएँ हैं – या कि सत्य कोई अभी कल थे सभी, न आज कोई । राजीव जी प्रणाम । जीवन और मृत्यु के रहस्यों पर लिखी छायावादी और मन की व्यथा झलकाती सुंदर कविता ।

    rajeev dubey के द्वारा
    March 8, 2011

    प्रिय मिश्रा जी, प्रतिक्रिया पर आभार… चिंतन की प्रक्रिया में यह विषय उठता ही है… और जब यह ढृढ़ता से धारणा के केंद्र में आता है तो ध्यान की सघनता में ….

allrounder के द्वारा
March 7, 2011

राजीव जी, जीवन के अंतिम और अटल सत्य जिसे हर व्यक्ति जानता है फिर भी उससे डर कर भागता है इस पर एक अच्छी रचना के लिए बधाई !

    rajeevdubey के द्वारा
    March 7, 2011

    सचिन जी, सच कहा आपने … धीरे धीरे पास आती मृत्यु जितनी भुलाई जा सके उतना ही भला…यही तो है जीवन का खेल…सारे व्यापार यही तो हैं… वैसे मृत्यु भी तो हर सांस पर एक खेल खेलती है और हम उसी को भूल उस खेल में रम जाते हैं …!

NIKHIL PANDEY के द्वारा
March 7, 2011

हर ओर सजती हैं सहमी अर्थियाँ फिर भी जीवन के पल लंबे लगते हैं ! बहुत गहरे अर्थ लिए हुए पंक्तिया है.. जीवन के अर्थ को तलाश करती हुई रचना जैसा की अलका जी ने कहा की इस विषय को समझा पाना बहुत कठिन है.. क्योकि समझ पाना ही मुश्किल है .. आपका प्रयास अच्छा लगा…

    rajeevdubey के द्वारा
    March 7, 2011

    निखिल जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार…आपकी बात सही है…मृत्यु और जीवन का गूढ़ सम्बन्ध है…

vinita shukla के द्वारा
March 7, 2011

जीवन की रहस्यमयी उलझन को अर्थपूर्ण ढंग से उजागर करती सार्थक रचना.

    rajeevdubey के द्वारा
    March 7, 2011

    विनीता जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार…

aksaditya के द्वारा
March 7, 2011

मेरे शहर में अब श्मशान सजते हैं , मरने वाले भी खुश खुश मरते हैं , एक सुदर छायावादी कविता के लिए बधाई |

    rajeevdubey के द्वारा
    March 7, 2011

    अरुणकांत जी, आशा है मैंने आपका नाम सही सही लिखा है…प्रतिक्रिया के लिए आभार…

Alka Gupta के द्वारा
March 6, 2011

दुबे जी , मृत्यु जैसे गूढ़ विषय को समझ पाना दुरूह ही है अंतिम दो पंक्तियों में जीवन मृत्यु को बहुत ही सुन्दर शब्दों में बताया है बहुत ही अच्छी रचना !

    rajeev dubey के द्वारा
    March 7, 2011

    अलका जी, प्रतिक्रिया पर आभार … सामान्यतया मृत्यु का विचार दूर ही हो तो ज्यादा अच्छा लगता है, फिर भी चिंतन की दृष्टि से यह एक मूल प्रश्न है…

rameshbajpai के द्वारा
March 6, 2011

दुबे जी यथार्थ तो यही है | बेवाक दृष्टि पात किया आपने |

    rajeev dubey के द्वारा
    March 6, 2011

    बाजपेयी जी, कालः क्रीडति गच्छत्यायु: तदपि न मुञ्चत्याशावायुः  …………. प्रतिक्रिया पर आभार

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 6, 2011

सब छायाएँ हैं – या कि सत्य है कोई अभी कल थे सभी, नही आज है कोई । जीवन रहस्यमय कुहासा तो मृत्यु अनजान अंधेरा सब स्वयं ही इनमें अनचाहे गुम हुए जाते हैं ! प्रिय राजीव जी ….नमस्कार ! हर ओर सजती हैं सहमी अर्थियाँ फिर भी जीवन के पल लंबे लगते हैं ! सच में मौत के साये में गुजर रही जिन्दगी aur मौत से जुड़े हुए अनसुलझे हुए सवालों को बड़ी ही खूबसूरती से बयां किया है आपने मुबारकबाद

    rajeev dubey के द्वारा
    March 6, 2011

    राजकमल जी, हार्दिक आभार आपका…मैं देख सकता हूँ कि आपने भी विचार किया है इन प्रश्नों पर… बड़ी ही विचित्र बात है, अगली श्वास का संभाव्य सत्य कितने निकट होते हुए भी कितना दूर ही रहता है …

nishamittal के द्वारा
March 6, 2011

दुबे जी मौत जीवन का एक सच है पर कोई नहीं समझ पाया इसको.अच्छी रचना है आपकी.

    rajeev dubey के द्वारा
    March 6, 2011

    निशा जी, हाँ … बड़ा ही गूढ़ है यह विषय …आभार

आर.एन. शाही के द्वारा
March 6, 2011

मृत्यु के सापेक्ष गहरी दृष्टि दुबे जी … बधाई ।

    rajeev dubey के द्वारा
    March 6, 2011

    शाही जी, मृत्यु के ध्रुव सत्य पर चिंतन जीवन को बदल देता है…प्रतिक्रिया पर हार्दिक आभार…

Harish Bhatt के द्वारा
March 6, 2011

rajeev ji saadar pranaam, bahut hi shaandaar kavita ke liye hardik badhayi.

    rajeev dubey के द्वारा
    March 6, 2011

    हरीश जी, आभार…

Deepak Sahu के द्वारा
March 6, 2011

सुंदर रचना आपकी! राजीव जी! बधाई ! दीपक साहू

    rajeev dubey के द्वारा
    March 6, 2011

    दीपक जी, प्रतिक्रिया पर आभार…मृत्यु के ध्रुव सत्य पर रचना आपके युवा ह्रदय को सुन्दर लगी यह अपने आप में गहरी बात है…


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