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तू क्यों अकेली ?

Posted On: 26 Feb, 2011 में

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एक बार एक चिड़िया से
पूछा आकाश ने -
“क्या तुम खो गई हो ?
क्यों अपनों से दूर अकेली – चुपचाप उड़ती फिरती हो ?”

 

चिड़िया बोली -
“अरे आकाश !
वे सब जो अधिक सोचते हैं, स्वर्ग बनाने के स्वप्न देखते हैं …
उनकी यही नियति है ।”

 

यह सुन मर्माहत हो
एक बादल का टुकड़ा
नज़दीक आया
थोड़ा अपनापन दिखलाया ।

 

बादल बोला -
“चलो, मैं तुम्हारे संग चलूँगा,
जहाँ कहोगी,
मैं बरसूंगा ”

 

चिड़िया खेत-खेत
पानी ले पहुँची
फसलों को जीवन दे चहकी
खुश थी, वह मन की न्यारी … ।

 

फिर वह
धीरे से नीचे उतरी…
पर हाय, जाल बिछा था !
बादल भी बरसा ही था ।

 

गीले पंख
और भारी जाल – चिड़िया उड़ न सकी !
पर धरती चुप थी,
वह न बोली – तू क्यों अकेली ?

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

RajniThakur के द्वारा
February 28, 2011

राजीव जी, ये हुई न बात ! भावार्थ के साथ साथ रचना को समझना चिंतन की एक नई धारा प्रवाहित करती है …बहुत बहुत धन्यवाद.

rajkamal के द्वारा
February 27, 2011

प्रिय राजीव जी ….नमस्कार ! आपने बुधि रूपी गुरु का जिक्र किया है ….. बुधि की बात तो मैं नही जानता लेकिन गुरु के बारे में जरूर पढ़ा है की सच्चा गुरु अपने सेवक को कभी भी रसातल में जाने नही दे सकता ….. उसके सारे प्रयास + तपस्या+सारी प्रार्थनाए अपने शिष्य के उत्थान के लिए होती है ************************************************************************************************************ आपने इस कविता का भावार्थ देकर हम सभी पर उपकार का कार्य किया है धन्यवाद एवम बहुत -२ बधाईयाँ

    rajeev dubey के द्वारा
    February 27, 2011

    राजकमल जी, गुरु की महिमा और प्रेम तो है ही अपार…एक बार मेरी हवाई यात्रा में विलम्ब के चलते रात्रि के तीन बजे जब एक स्थान पर पहुंचा … जहां पर कि मेरे गुरुदेव भी ठहरे थे… तो पाया कि वहां इतने लोगों की उपस्थिति के बाद भी द्वार उन्होंने स्वयं खोला … अब और क्या कहूं…! …………………………………………………………. कविता में कई बिम्ब हैं और बस थोड़ा सा संकेत मात्र है… बाकी तो गीताकार स्वयं कह गए हैं कि आत्मोद्धार के मार्ग पर चल रहे व्यक्ति के बंधन में पड़ जाने पर भी उसका नाश नहीं होता, वह पुनः अगले जन्म में उसी मार्ग पर चल पड़ता है… (श्रीमद्भग्वद्गीता, ६/४०)

Tufail A. Siddequi के द्वारा
February 27, 2011

राजीव जी संवेदनाओं से परिपूर्ण रचना. बधाई.

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    तुफैल जी, बहुत बहुत आभार आपका …

Ramesh bajpai के द्वारा
February 27, 2011

राजीव जी संवेनाओ से ओतप्रोत यह मार्मिक उडान बहुत भायी| बहुत बहुत बधाई |

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    बाजपेयी जी, यह तो अच्छा हुआ…जल्दी ही और नई उड़ानों पर ले जाने का प्रयास करूंगा, आभार

Harish Bhatt के द्वारा
February 27, 2011

राजीव जी बहुत ही बेहतरीन कविता के लिए हार्दिक बधाई. आपकी हरेक रचना सोचने और बेहतर करने के लिए प्रेरित करती है.

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    हरीश जी, प्रतिक्रया पर बहुत बहुत आभार… आप स्वयं इतने अच्छे लेख लिखते हैं…

shab के द्वारा
February 27, 2011

राजीव जी नमस्कार बहुत अच्छी कविता लिखी है आप ने आप की रचना देखकर हमारे मन मैं भा विचार आते है……

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    शब् जी, यह तो बड़ी खुशी की बात है, अब आप ढेरों सुन्दर रचनाएं कर डालिए…इंतज़ार रहेगा

आर.एन. शाही के द्वारा
February 27, 2011

आपकी कविताओं में छुपे भाव मन को छूते हैं दुबे जी । बधाई ।

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    शाही जी, आपके पास एक संवेदनशील मन जो है…आभार

rajeev dubey के द्वारा
February 27, 2011

मित्रों, इस कविता का एक भावार्थ लिखा था…इस दृष्टि से देखिएगा, शायद कुछ आनंद दे … …………………………………………………………… चिड़िया उस उत्साही मन का प्रतीक है जो परिवर्तन चाहता है … कुछ भला, कुछ नया…… इसे जीव भी मान सकते हैं । आकाश उस विशाल तत्व का प्रतीक है जो हमारे अन्तर्मन के रूप में हमसे बात करता है । बादल उस बुद्धि का प्रतीक है जो हमें राह दिखाती है, साथ देती, यह गुरु का भी प्रतीक है… जीवन की सदाशयता का प्रतीक है । और धरती उस सत्य का प्रतीक है जिसे प्रकृति या माया भी कहते हैं । चिड़िया का कुछ कर पाने पर सब भूल नीचे उतार जाना मोह का प्रतीक है… उसे उड़ते ही जाना था । जाल, इत्यादि संसार है । बहुत सारे पंछी इस बंधन में फंस चुके हैं… इसलिए धरती चुप रहती है…। शेष बिम्ब हैं और उनके विभिन्न घुले मिले अर्थ हैं…

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 27, 2011

    राजीव जी, इस सुन्दर कविता के भावार्थ प्रस्तुत किये आपने जिससे ढंग से इस कविता को समझ पाया|बहुत आभार,

    Alka Gupta के द्वारा
    February 27, 2011

    दुबे जी , कविता का यह अति सुन्दर भाव तो मन को इतना आह्लादित कर गया कि वर्णन नहीं कर सकती मन की गहराइयों तक चले गए ये भाव मैंने तो उसे कुछ अलग ही रूप दिया अति सुन्दर भाव , दुबे जी

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    वाहिद जी, एक दृष्टिकोण से दिखाने का मेरा यह प्रयास भला लगा…यह जान प्रसन्नता हुई …आभार

    rajeev dubey के द्वारा
    February 27, 2011

    अलका जी, आपको भावार्थ से नए अर्थ निकलते देख आह्लाद की अनुभूति हुई … यह तो बड़े आनंद की बात है…

Alka Gupta के द्वारा
February 27, 2011

दुबे जी , एक ओर वे हैं जो दूर-दूर तक उड़ते हैं व स्वर्ग बनाने के स्वप्न देखते हैं दूसरी ओर वे हैं जो सही में कर्म करने में ही विश्वास करते हैं जीत हमेशा उनकी ही होती है शायद कुछ ऐसे ही भाव हैं इस कविता के….. बहुत ही सुन्दर रचना !

    rajeev dubey के द्वारा
    February 27, 2011

    अलका जी, कविता पर पढ़ने वालों का कवि से ज्यादा अधिकार होता है . . . क्योंकि वही कविता को भावना की नयी उड़ान देते हैं… मैंने एक भाव ऊपर व्यक्त किया है, उसे भी देखिएगा…


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