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क्या सार्थक है ?

Posted On: 25 Feb, 2011 में

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क्या सार्थक है ?
सागर की मर्यादा
या नदी की आतुरता ?
काश कि मैं जान पाता !

 

तो मैं दे पाता उत्तर
उन आँखों को
जो स्वप्न संजोये
बैठी हैं सुबह से।

 

मैं जा पाता सामने
बिना डरे
और बंधा पाता ढांढ़स
किसी के विछोह पर ।

 

पर मैं भ्रमित हूँ
उजले दिन और
काली रात के मेल पर
साँझ भली या सुबह ?

 

क्या सार्थक है ?
शिखरों की ऊँचाई
या नींव की अंधेरों भरी गहराई ?
काश मैं जान पाता !

 

तो बता पाता निश्चित उत्तर
और रास्ते, इन नन्हे-नन्हे
उतावली आँखों वाले
प्रश्न पूछते बच्चों को।

 

पर मैं भ्रमित हूँ
उत्तुंग शिखरों के अकेलेपन
और नींव के पत्थरों पर
पड़ने वाले दबाव से !

 

क्या सार्थक है ?

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39 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Pankaj Pandey के द्वारा
February 27, 2011

अति उत्तम. मित्र, कॉलेज के समय नहीं पता था कि एक संयत सा शांत स्वभाव का मित्र इतने गंभीर विचार वाला एक उत्कृष्ट रचनाकार भी है. पुनश्च अति उत्तम और प्रार्थना कि प्रयास जारी रखें.

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    प्रिय पंकज जी, आपकी इतनी प्रेम से भरपूर प्रतिक्रिया पर क्या कहूं ….! आपके पास मेरा ईमेल पता होगा… जरूर लिखिएगा . आभार एवं शुभेक्षा के साथ

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
February 27, 2011

पर मैं भ्रमित हूँ उत्तुंग शिखरों के अकेलेपन और नींव के पत्थरों पर पड़ने वाले दबाव से ! बहु सुन्दर कविता दुबे जी ! बधाई

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    शैलेश जी, आप तो स्वयं हिन्दी के विस्तृत शब्दकोष के स्वामी हैं, आपकी प्रतिक्रया मन को भाती है

sanjay kumar tiwari के द्वारा
February 27, 2011

behtreen prastutti dube ji …..Aabhar sahit ………

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    संजय जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार…स्नेह बनाए रखियेगा

charchit chittransh के द्वारा
February 26, 2011

राजीव जी ,बधाईयाँ !!! उत्कृष्ट साहित्यिक पुरुस्कार प्रतियोगिता स्तरीय रचना .

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    चर्चित चित्रांश जी, आपको किस नाम से पुकारूं जो आपको भी मीठा लगता हो … मुझे आपकी प्रतिक्रिया में अपनापन दिखा, भोपाल आता रहता हूँ…अगली बार शायद मार्च के अंत में या फिर अप्रैल की शुरुआत में आऊँगा तो हो सके तो भेंट का अवसर दीजिएगा.

rajkamal के द्वारा
February 26, 2011

प्रिय राजीव जी …नमस्कार ! आपके उस सद्भावनापूर्ण प्रयास से चाहे जन्मो जन्मान्तरो से पड़े परदे फिलहाल हट गए है लेकिन आप का जो स्तर है उसको देखते हुए लगता है की अगली बार भी शायद आपको ?…. बहुत -२ आभार

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    राजकमल जी, अब मैं क्या कहूं… आपका अपना हूँ और प्रस्तुत हूँ, जो भी थोड़े बहुत पुष्प परमेश्वर ने मुझे सौंपे हैं, सब आप सबके ही है…

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 27, 2011

    राजीव जी, कवि हृदय की समाज के प्रति व्याकुलता को आपने ‘क्या सार्थक है’ के माध्यम से बखूबी प्रस्तुत किया है|

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    वाहिद जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार.

nishamittal के द्वारा
February 26, 2011

दुबे जी,उत्कृष्ट भावपूर्ण गहन रचना पर बधाई आपको.

    rajeevdubey के द्वारा
    February 26, 2011

    निशा जी, आपकी प्रबुद्ध प्रतिक्रिया सदैव प्रसन्नता की बयार लाती है…

RajniThakur के द्वारा
February 26, 2011

राजीव जी, कविता के साथ भावार्थ लिखकर आपने मुझ जैसे पाठकों का भला किया है जो आपकी हर रचना को अपने समझ के साथ साथ आपके नज़रिए से भी समझना चाहते हैं.

    rajeevdubey के द्वारा
    February 26, 2011

    रजनी जी, यह तो बड़ी अच्छी बात बतायी आपने, मैं कोशिश करूंगा कि अपनी पूर्व में प्रस्तुत रचनाओं पर भी कुछ व्याख्या लिखूं और प्रस्तुत करूँ मंच पर…यह विचार कुछ और लिखने की प्रेरणा दे रहा है …

आर.एन. शाही के द्वारा
February 26, 2011

आपकी एक और अनुपम कृति दुबे जी … बधाई ।

    rajeevdubey के द्वारा
    February 26, 2011

    शाही जी, बहुत बहुत आभार… आपसे यह संवाद भला लगता है ..

allrounder के द्वारा
February 26, 2011

राजीव जी, बहुत ही उत्कृष्ट कृति पर बधाई !

    rajeevdubey के द्वारा
    February 26, 2011

    सचिन जी, आपकी प्रतिक्रियाएं देख बड़ा आनंद होता है…

shab के द्वारा
February 26, 2011

rajeev ji bahut acchi rachna hai aapki ……

    rajeevdubey के द्वारा
    February 26, 2011

    आभार शब् जी …

February 26, 2011

राजीव जी सुन्दर कविता और साथ में उसका भावार्थ भी देने के लिए बधाई.

    rajeevdubey के द्वारा
    February 26, 2011

    राजेन्द्र जी, कविता सुन्दर लगी यह जान हर्ष हुआ, आगे से कोशिश रहेगी की भावार्थ भी देता रहूँ..

sdvajpayee के द्वारा
February 26, 2011

  राजीव जी, दो बार पढनी पडी। ठहराव के साथ। आपके विचार प्रवाह की यह सार्थकता है। उत्‍तुंग शिखर, और नींव के पत्‍थर , यही द्वंद तो नचाये-बहलाये रखता है। जब तक नदी है द्वैत जन्‍य आतुरता -विकलता रहती ही है। नदी जब सागर में समा गयी, एकाकार हो गयी तो मर्यादा उसका स्‍वभाव-धर्म  हो जाता है।

    rajeevdubey के द्वारा
    February 26, 2011

    वाजपेयी जी, आपकी प्रतिक्रया के लिये आभार…और इसी द्वन्द्व के बीच आसक्तिरहित परन्तु कर्तव्य कर्म के प्रति सम्पूर्ण निष्ठा के साथ जी जाना मनुष्य में ब्रह्म साकार कर जाता है…!

Alka Gupta के द्वारा
February 26, 2011

दुबे जी , इस जीवन दर्शन के प्रति अद्वितीय विचार, भ्रमात्मक दृष्टिकोण और प्रश्न भी शाश्वत है बहुत अच्छी कविता !

    rajeev dubey के द्वारा
    February 26, 2011

    अलका जी, सच कहा आपने… जीवन जीते हुए यह प्रश्न आते ही हैं… हाँ यदि एक स्मित भी खिल उठे तो समझ लीजिये कि कुछ-कुछ लीलाधर की लीला का आभास हो चला है…

vinita shukla के द्वारा
February 26, 2011

जीवन एक अनबूझ पहेली है. जाने अनजाने सुधीजन, इसके विश्लेषण में उलझकर रह जाते हैं. ऐसी ही स्थितियों की सुन्दर व्याख्या करती हुई, इस कविता के लिए आपको बधाई.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 26, 2011

    विनीता जी, आपकी सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार…

kmmishra के द्वारा
February 26, 2011

राजीव जी सादर वंदेमातरम ! आज आपकी कविता में छायावाद देखकर और नीचे उसका भावार्थ देखकर लगा कि शायद निकट ही कोयी अनहोनी घट गयी है । कारण जो भी हो मगर प्रश्न शाश्वत हैं । आभार ।

    rajeev dubey के द्वारा
    February 26, 2011

    प्रिय मिश्रा जी, नहीं – नहीं सांसारिक सन्दर्भों में ही सही पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है, और फिर अनहोनी कहें भी तो किसे…सब कुछ होनी ही है…वह तो जब मैं चेतना के विभिन्न स्तरों पर विचरता हूँ तब कई जन्म देख लेता हूँ मानो …और फिर किसी आयाम से भाव शब्द बन कर उभर आते हैं…… आपकी प्रेम पूर्ण टिप्पणी बहुत अच्छी लगी, स्नेह बनाये रखियेगा

rajeev dubey के द्वारा
February 26, 2011

कुछ पाठकों ने इस कविता के भावार्थ पर प्रकाश डालने का अनुरोध किया है…प्रस्तुत है: ………………………………………………………………………………………………………………. संसार में जीवन विपरीत ध्रुवों के बीच डोलता रहता है. भावनात्मक स्तर पर भी ऐसा ही होता है. मृत्यु शाश्वत सत्य है फिर भी हम जीवन सतत चाहते हैं…यही माया है …इन्हीं सन्दर्भों में, यह रचना कुछेक प्रश्नों को उठाती है …कि क्या सार्थक है, सागर की तरह मर्यादित रहना या कि नदी की तरह पानी के कम या ज्यादा होने पर अपना रूप बदल बदल कर दिखाते हुए मानों पूरी आतुरता के साथ जीवन जीना…यदि यह पता चल पाता तो स्वप्नों को संजो कर रखे हुए ह्रदय को बताया जा सकता कि इंतज़ार किया जाए…चुपचाप धैर्य के साथ, या, जी ली जाए जिन्दगी जो सामने है उसके साथ, पूरी शिद्दत के साथ …! एक और तरीके से देखते हैं, दिन और रात के मिलन बिंदु का ही एक रूप सुबह है, तो दूसरा रूप सांझ है, परन्तु, सुबह जीवन की शुरुआत का प्रतीक है और सांझ अवसान का…लेकिन अवसान के बाद ही तो शुरुआत हो सकती है… एक नयी, शायद बेहतर…इसलिए किसी के विछोह पर क्या कह कर समझाऊँ किसी को … आगे का भावार्थ शायद स्पष्ट होगा … आप कहेंगे तो फिर और लिखूंगा…शुभेक्षा सहित.

Arunesh Mishra के द्वारा
February 26, 2011

बहुत सधी हुई कविता दुबे जी.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 26, 2011

    प्रतिक्रया पर बहुत बहुत आभार अरुणेश जी.

Harish Bhatt के द्वारा
February 26, 2011

राजीव जी सादर प्रणाम, बहुत ही अच्छी कविता के लिए हार्दिक बधाई.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 26, 2011

    हरीश जी, आप बस थोड़ा सा ही कहते हैं … पर बहुत कुछ दे जाते हैं…प्रतिक्रया पर आभार.

rajkamal के द्वारा
February 25, 2011

प्रिय राजीव जी ….नमस्कार ! आज तो मुझको सच में ही आपकी इस कविता ने भर्मित कर दिया है ….. इस भरम से भी हमेशा की तरह आप ही पर्दाफाश करेंगे ….. धन्यवाद

    rajeev dubey के द्वारा
    February 26, 2011

    राजकमल जी, मैंने ऊपर कुछ प्रकाश डाला है, आंशिक भावार्थ के द्वारा… शायद पर्दा हटे…प्रतिक्रिया पर आभार सहित.


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