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भूल या उपहार

Posted On: 23 Feb, 2011 में

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खोल दिया क्यों ओ नन्हे बच्चे
तुमने मेरे पिंज़ड़े का द्वार ?

 

आज बड़ी ही है उलझन
ये भूल तुम्हारी या उपहार !

 

खुश हूँ सुन कर बात तुम्हारी …
कि उड़ जाऊं दूर क्षितिज के पार ।

 

सच बोलो…
सोच जरा फिर ।

 

फिर न होगा बंध किसी का
ये पिंजड़े का द्वार !

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

charchit chittransh के द्वारा
February 26, 2011

राजीव जी , नमस्कार ! आपकी नवीनतम रचना पर प्रतिक्रिया देते नहीं बनी {मेरी सीमित बुद्धि अर्थ और सन्दर्भों की खोज में असफल रही, अवश्य ही कुछ गूढ़ सन्देश छिपा होगा }किन्तु इस कविता में सब कुछ ग्राह्य मिला -उच्चकोटि का साहित्य , सीमित शब्दों में भरी भरकम सन्देश , सरलता, सहजता और लयबद्धता आदि जितनी प्रशंशा की जाए कम है .

    rajeev dubey के द्वारा
    February 26, 2011

    चर्चित चित्रांश जी, आपको यह कविता पसंद आयी यह जान हर्ष हुआ…”क्या सार्थक है?” पर एक आंशिक भावार्थ लिख छोड़ा है … अपने विचार जरूर लिखिएगा…आभार सहित.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 27, 2011

    राजीव जी, एक पंछी को प्रतीक बना कर सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति की है आपने|

    rajeev dubey के द्वारा
    February 27, 2011

    वाहिद जी, आभार आपका …

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
February 24, 2011

अद्भुत भाव हैं आप की इस रचना के बहुत बहुत बधाई … खोल दिया क्यों ओ नन्हे बच्चे तुमने मेरे पिंज़ड़े का द्वार ? आज बड़ी ही है उलझन ये भूल तुम्हारी या उपहार ! ये पक्तियां हृदय को छू ले रही हैं ….

    rajeev dubey के द्वारा
    February 25, 2011

    शैलेश जी, मुझे भी ये पंक्तियाँ जब प्रकट हुईं तब बड़ा ही आनंद हुआ था…प्रतिक्रिया के लिए आभार

Preeti Mishra के द्वारा
February 24, 2011

थोड़े से शब्दों में आपने बहुत कुछ कह दिया राजीवजी. सुंदर रचना. बधाई.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 25, 2011

    प्रीती जी, रचना पसंद आई यह जान कर हर्ष हुआ, आभार

rajnithakur के द्वारा
February 24, 2011

राजीव जी, रचना बेहद अच्छी लगी.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 24, 2011

    रजनी जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार.

deepak pandey के द्वारा
February 24, 2011

बहुत ही यथार्थपूर्ण रचना . दुबे जी , बधाई.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 24, 2011

    दीपक जी, रचना पसंद आयी यह जान कर अच्छा लगा…बड़ा प्रेम है आप सबका मुझ पर.

आर.एन. शाही के द्वारा
February 24, 2011

आपकी रचनाएं बहुत कुछ सोचने पर विवश करती हैं दुबे जी । साधुवाद ।

    rajeev dubey के द्वारा
    February 24, 2011

    शाही जी, यदि विचार उठ रहे हैं आपके मन में भी, तब तो दूरगामी तरंगों का प्रेषण होने लगा है, बस जल्दी ही मुलाकात भी होगी…! प्रतिक्रिया के लिए आभार

allrounder के द्वारा
February 24, 2011

राजीव जी, बेहतरीन सोच के साथ व्यक्त किये गए उद्गारों पर बधाई !

    rajeev dubey के द्वारा
    February 24, 2011

    सचिन जी, हार्दिक आभार , रचना पसंद आयी यह जान आनंद हुआ …

vinitashukla के द्वारा
February 24, 2011

सुन्दर भाव. एक पंछी खुला पिंजरा देखकर भी उड़ता नहीं, बल्कि उसे खोलने वाले बालक से पूछता है कि पिंजरे का द्वार फिर किसी दूसरे पंछी के लिए बंद तो नहीं होगा.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 24, 2011

    विनीता जी, एक पंछी में भी, अपनी आज़ादी खोने की पीड़ा अपने जैसे किसी दूसरे को न मिले, की चिंता हो सकती है….आपने सही कहा. आभार

nishamittal के द्वारा
February 24, 2011

आदरनीय दुबे जी बहुत सुंदर रचना एक बेजुबान के भावों को ब्यान करती.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 24, 2011

    निशा जी, प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार.

rajkamal के द्वारा
February 23, 2011

सुना है की अब तो पंछी भी उनसे बाते किया करते है अपना दुःख उनसे कहते है और उनका दुःख सुना करते है ….. प्रिय राजीव जी …..एक बेजुबान को आपने अपनी कलम से जुबान दी ….. सुंदर कविता के लिए बधाई

    rajeev dubey के द्वारा
    February 24, 2011

    राजकमल जी, चेतना के एक आयाम पर आपने जो लिखा वह संभव है. जीव ही क्यों – जड़ भी चेतन की इच्छानुसार चलने लगता है, और हाँ, यह बात किताबी नहीं है…प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार .


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