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चिंगारी

Posted On: 22 Feb, 2011 में

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चाहती है रात्रि कि जाग जाए चिंगारी वह
जो सोयी हुई है अनजान – निश्चल ।

 

बने ज्वाला और उठे गगन में प्रातः
और तपिश दे इतनी कि पिघल उठें पाषाण …।

 

फिर ढाले नए सांचे में दिन वह द्रव ले
तपा कर गर्म दोपहरी में ।

 

सांझ को सौंप दे भर शक्ति अंग अंग में
और अगली रात्रि, जागे वह बन प्रहरी !

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
February 24, 2011

दुबे जी ! सुन्दर रचना बधाई …

    rajeevdubey के द्वारा
    February 25, 2011

    शैलेश जी, हार्दिक आभार.

Preeti Mishra के द्वारा
February 24, 2011

सुंदर और मोहक अभिव्यक्ती राजीवजी. बधाई.

    rajeevdubey के द्वारा
    February 25, 2011

    प्रीती जी, प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार.

vinitashukla के द्वारा
February 24, 2011

सोते हुओं को जगाने का शुभ आह्वान. बधाई.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 24, 2011

    धन्यवाद विनीता जी.

deepak pandey के द्वारा
February 23, 2011

राजीव जी, सुन्दर कविता. इश्वर इस चिंगारी को आग में बदलने की ताक़त दे.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 23, 2011

    दीपक जी, जरूर, आपके सब के सहयोग से यह जरूर होगा, आभार

Alka Gupta के द्वारा
February 23, 2011

दुबे जी , आज की सोई हुई चिंगारी को जगाने के लिए उत्तेजित गहन भावों से परिपूर्ण हैं यह आपकी कविता !

    rajeev dubey के द्वारा
    February 23, 2011

    अलका जी, प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार

आर.एन. शाही के द्वारा
February 23, 2011

अत्यंत ऊर्जावान ख्वाहिश है दुबे जी । बधाई ।

    rajeevdubey के द्वारा
    February 23, 2011

    शाही जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार… एक ऐसे बिंदु तक ले जानी है वैचारिक तीव्रता कि बस जाग उठें लोग…

Rajni Thakur के द्वारा
February 23, 2011

राजीव जी, आपकी वह कविता ही क्या, जिसके गंभीर भाव विचारों को उद्द्वेलित न करें..

    rajeevdubey के द्वारा
    February 23, 2011

    रजनी जी, भाव उद्वेलित हुए हैं तो कर्म में भी बदलेंगे…जरूरत है देश को युवा शक्ति के जागरण की..प्रतिक्रिया के लिए आभार

Harish Bhatt के द्वारा
February 23, 2011

राजीव जी प्रणाम, बहुत अच्छी कविता के लिए हार्दिक धन्यवाद.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 23, 2011

    हरीश जी, प्रणाम. आपको रचना पसंद आई यह जान हर्ष हुआ, प्रतिक्रिया के लिए आभार

rajkamal के द्वारा
February 22, 2011

प्रिय राजीव जी …. नमस्कार ! जहाँ ना पहुंचे रवि पहुंचे वहां कवि इस कविता में रात्रि से क्या भाव है , जो की सोये हुए अरमानों + चेतना + विवेक +स्वाभिमान को जगाना चाह रही है …..

    rajeevdubey के द्वारा
    February 23, 2011

    राजकमल जी, इस रात्रि में यह प्रश्न देखते ही मुझे मालुम चल गया कि अब चिंगारी जरूर उठेगी…रात्रि हमारे इस कालखंड की है जब हमारे जन सोये हुए हैं…सुबह हमारे पुनर्जागरण की होगी…विचारों की तीव्र तपिश से भरी, वह सुबह ठंडी या शीतल न होगी…और जब अगली बार फिर हमारे देश में रात्रि रूपी कठिन समय आयेगा तब हमारे जन प्रहरी बन जागेंगे…ऐसे विचार जगा देने हैं, एक ऐसा आन्दोलन खड़ा कर देना है…

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 27, 2011

    राजीव जी, देशवासियों को जगाने का प्रयास करती आपकी यह अपील रुपी कविता बहुत सुन्दर बन पड़ी है|

    rajeevdubey के द्वारा
    February 27, 2011

    वाहिद जी, आपकी प्रतिक्रया का इंतज़ार रहता है… आशा है सब कुशल मंगल है …आभार एवं शुभेक्षा के साथ.

priyasingh के द्वारा
February 22, 2011

दिन के हर पहर को आपने अपनी रचना में शामिल कर लिया है ………….. उत्तम प्रस्तुति…………

    rajeevdubey के द्वारा
    February 22, 2011

    प्रिया जी, प्रतिक्रया पर आभार… हाँ, पर इस कविता की सुबह दोपहरी से भी ज्यादा गर्म – ज्वालाओं से भरी होगी…वह सुबह भारत के पुनर्जागरण की होगी और चिंगारी उन विचारों की है जो हमारे पाषाणवत निष्क्रिय हो चुके जनों को पिघला कर उद्वेलित कर आक्रोश से भर दें …

    priyasingh के द्वारा
    February 23, 2011

    कविता का मर्म आपने आक्रोशित शब्दों में समझाया उसके लिए शुक्रिया…………….

    rajeevdubey के द्वारा
    February 23, 2011

    आपका स्वागत है प्रिया जी.


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