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समय

Posted On: 18 Feb, 2011 में

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समय ! तेरे अजस्र प्रवाह में -
गुजरते पलों की गहराईयों में,
मैं न जाने कहाँ से कहाँ…
चला आया हूँ ।
 

मैं खोजता रहा शांति कभी,
और फिर क्षोभ ज्वार मॆं डूब,
कभी किसी पदचाप को सुन -
अनजानी नींदों से जागा हूँ ।

 

सत्य साधक बना कभी,
फिर व्यथित सा अकथ्य कथा बना,
कुछ आँसू ढुलका…
न जाने किसे बुलाता रहा हूँ ।

 

तू काल ! चलता रहा संग,
मैं तेरे अनजान आयामों में -
करता अनगिनत उपाय,
तुझे खोजता रहा हूँ ।

 

मैं जीवन के वैरागी क्षणों में,
अनुभूति को ‘परा’ की ओर से -
खींच कर जाने अनजाने,
नए आवरण ओढ़ता रहा हूँ ।

 

नए सूर्यों को हर सबेरे,
बिखेरते अपनी लालिमा और कांति,
हर सांझ डूबते, खो जाते देखता -
निःशब्द निर्जनों में घूमता रहा हूँ ।

 

मैं करता रहा हास,
फिर रूक कर अचानक किसी पल,
समय ! तेरी डोर खींचने को,
विचारों मॆं लड़ता रहा हूँ ।

 

मैं मन्द शीतल हवाओं में,
छोटी सी कुटी छा,
हर सांझ नितांत अकेला,
तूफानों को स्वप्न करता रहा हूँ ।

 

समय ! तेरे हास के अर्थ -
जान कर भी न जाने क्यों…
हर दिन जाने अनजाने…
नए नए बिम्बों में ढलता रहा हूँ ।

 

मैं छायाओं को अपना समझ,
घुल मिलकर संग गीत कहते,
फिर उनके बढते आकार …
यकायक विलीन होते देखता रहा हूँ ।

 

कभी बना तू कराल,
या तुझे बनाकर अपनी ढाल,
तू मेरे संग या मैं तेरे -
मैं यह सूत्र खोजता रहा हूँ ।

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajkamal के द्वारा
February 19, 2011

प्रिय राजीव जी …नमस्कार ! आपने समय पर बहुत ही सुंदर कविता लिखी है ….. आप कविता में ब्यान भी करते है खुद से लड़ते भी है सभी रंग देखने में मिलते है बधाई

    rajeev dubey के द्वारा
    February 19, 2011

    राजकमल जी, आपकी प्रतिक्रिया पर ह्रदय में एक आनंदप्रद लहर उत्पन्न हो ही जाती है, आभार…

आर.एन. शाही के द्वारा
February 19, 2011

कविता के प्रवाह में भाव भी तैरते से प्रतीत होते हैं । गद्य और पद्य दोनों पर आपकी पकड़ लाजवाब है दुबे जी … बधाई ।

    rajeev dubey के द्वारा
    February 19, 2011

    शाही जी, आपकी सहृदयता के लिए आभार…प्रयत्न रहेगा कि रचनाओं में और निखार आये…

allrounder के द्वारा
February 19, 2011

राजीव जी, समय को अच्छे शब्दों मैं बाँधने के सराहनीय प्रयास पर बधाई !

    rajeev dubey के द्वारा
    February 19, 2011

    सचिन जी, आपकी प्रतिक्रया पर आभार…वैसे समय हम सबको नचाता है….मैंने अपने ही चले हुए क़दमों को समझने और समय की गति को महसूस कर व्यक्त करने का प्रयास किया है.

Alka Gupta के द्वारा
February 19, 2011

दुबे जी , समय के चक्र में जाने किधर घूम जाते हैं पता ही नहीं चलता और जब पता चलता है तो बहुत देर हो चुकी होती है यह छोड़ता किसी को नहीं है अपने विभिन्न रंगों में हम सभी को रंगता रहता है श्रेष्ठ कृति !

    rajeev dubey के द्वारा
    February 19, 2011

    अलका जी, आपकी प्रतिक्रिया आनंदप्रद लगी – जब विचार समझे जाने लगते हैं तब वह एक आकार लेकर जगत में परिवर्तन लाने की शक्ति पा जाते हैं….

RajniThakur के द्वारा
February 19, 2011

राजीव जी, समय की महत्ता को अपने ही रंगों में ढालती पंक्तियाँ बेहद प्रभावी बन पड़ी हैं..आपकी कवितायेँ कभी प्रेरणा बनती हैं तो कभी बहुत कुछ सिखाती भी हैं. धन्यवाद आपको.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 19, 2011

    रजनी जी, आपको कविता अच्छी लगे यह हर्ष की बात है…प्रेरणादायक लगे तब तो और भी अच्छा…आप अपने जीवन पथ पर आगे बढ़ें यही शुभेक्षा है

Ram Singh के द्वारा
February 18, 2011

बेहतरीन कविता.

    rajeevdubey के द्वारा
    February 19, 2011

    राम सिंह जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 18, 2011

श्री राजीव जी आपकी कविता का ग्राफ बहुत हाई है…बहुत ही उच्चकोटि की रचना.. आकाश तिवारी .

    rajeevdubey के द्वारा
    February 19, 2011

    आकाश जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार, कोशिश करूंगा कि और बेहतर रचनाएँ प्रस्तुत करता रहूँ…


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