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आत्म स्वीकृति

Posted On: 17 Feb, 2011 मस्ती मालगाड़ी में

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अपने आप को पहचानने की दिशा में पहला कदम स्वयं को स्वीकार करना है । इस आत्म स्वीकृति के साथ एक अद्भुत प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है, मानों घटनाओं का एक क्रम जन्म लेता है जो कि फिर जीवन में पूर्ण परिवर्तन पर ही जा कर ही रुकता है । इस परिवर्तन की एक झलक इस छोटी सी कहानी के रूप में समझने की कोशिश करते हैं …

 

एक बहुत ही सुंदर और गुणी लड़की थी। उसका नाम था आशा। सबकी दुलारी, सबकी प्यारी। आशा आनंद नाम के नगर में माही नदी के किनारे रहती थी। आशा को बचपन में एक सन्यासी ने एक वरदान दिया था … कि आशा जो कुछ भी पूरी आस्था के साथ चाहेगी वह हो जाएगा। ऐसा शक्तिशाली वरदान फिर भी जिसके पूरा होने के लिए आशा ने कभी कोई इच्छा नहीं की …बस जीवन यूँ ही चलता रहा ।

 

आशा सोचती थी की वह पढ़ लिखकर जीवन में आगे बढ़ेगी। वह अपनी माँ का घर के काम काज में हाथ भी बँटाती थी । उसका स्वप्न था कि एक दिन वह अपने सपनों के राजकुमार से विवाह करेगी और फिर सदा सुखी रहेगी। बस यही थी उसकी अपने जीवन से आशा। एक दिन आसमान में अचानक घने काले बादल घिर आए। तेज़ हवाओं के साथ एक ज़ोर का तूफान आया । उसके बाद जम कर बारिश हुई। आशा घर के बाहर वाले बरामदे में बैठ मौसम के इस बदले रूप का आनंद ले रही थी। वह आसमान में दूर दूर तक दृष्टि दौड़ा कर देखती रही । कहीं बिजली की कौंध उठ रही थी तो कहीं बादलों के झुंड के झुंड दौड़े जा रहे थे। उसके अंदर से एक इच्छा जाग उठी… आशा सोचने लगी कि बादलों की तरह यूँ ही दूर दूर तक विचरना कितना अच्छा होगा, काश कि वह यूँ ही बादलों की तरह विचरती…! ऐसा सोचते सोचते वह सो गई ।

 

अगली सुबह वह अचानक चौंक कर उठ बैठी । पैर नीचे रखे तो पाया कि घर में पानी भरा था। कुछ बर्तन इधर उधर तैर रहे थे…घर के बाकी लोग अभी भी सो रहे थे….अचानक एक ज़ोर की आवाज़ आई और उसने अपने घर को ढहते हुए देखा और फिर वह बेहोश हो गई।

 

जब आशा की आँख दुबारा खुली तो उसने पाया कि वह अस्पताल में है। पास में ही एक  नर्स बैठी थी। उसे बॉटल भी चढ़ाई जा रही थी। वह आश्चर्य से भर उठी । यह सब क्या हो गया। उसने इधर उधर नजरें दौड़ाईं तो पाया कि उसके माता पिता पास की सीटों पर बैठे सो रहे थे… ।  आशा ने चैन की साँस ली। थोड़ी देर में उसके माता पिता भी उठ बैठे । सुबह हो रही थी। उसके माता पिता उसे उठा देख बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे बताया कि वह पिछले तीन दिनों से बेहोश थी। डॉ ने कहा था कि चिंता की बात नहीं है । उसके माता पिता ने बताया कि अगले ही दिन वे लोग उसे हवाई जहाज़ में लेकर दिल्ली जाने वाले  थे । वे उसके मामा के घर जा रहे थे। उसका घर तेज़ बारिश और तूफान में ढह गया था। उसे अब उसकी माँ के साथ दिल्ली में रहना था। उसके पिता आनंद वापस आकर घर दुबारा बनवाने वाले थे।

 

आशा सोचने लगी कि यह सब अचानक क्या हो गया… तभी उसे अपना बादल की तरह से विचरने वाला विचार याद आया और वह अंदर तक सिहर उठी…एक इच्छा का यह परिणाम…!

 

अब जरा अपने जीवन पर विचार करो …. कितनी सारी इच्छाएँ, कितनी सारी आशाएँ और फिर हमारी भाग दौड़। ध्यान से देखने पर पता चलेगा कि अपना संसार हम स्वयं ही रचते हैं। बस अन्तर इतना ही है कि यह सब कुछ बहुत ही धीमी गति से होता है…क्रमशः ! यह सब कुछ इतना शनैः शनैः होता है कि हमें पता ही नहीं चलता और हम सोचने लगते हैं कि यह सब हमारे ऊपर बाहर से थोपा गया है।

 

याद रखो कि यह हम ही हैं जो इस जीवन चक्र का भोग करना चाहते हैं लेकिन भूल जाते हैं कि यह चक्र हमारे द्वारा ही रचा गया है। एक बार अपने आप को स्वीकार करो – पूर्ण रूप से, जीवन की हर वस्तु को , हर आश-निराश को और तुम पाओगे कि यह सारा जगत एक विचार मात्र है और जब तुम इस विचार पर और दृढ़ता से केंद्रित होगे तब मानों एक धमाके के साथ पता लगेगा…. एक अनोखी घटना घटेगी … तुम देख सकोगे कि तुम स्वयं ही व्याप्त हो हर ओर…ऐसी है सत्ता आत्म स्वीकृति की !

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 18, 2011

श्री राजीव जी, बहुत ही ज्ञानवर्धक और सशक्त लेख….जो इंसान खुद को जान जाएगा,उसे ईश्वर के दर्शन खुद हो जाएंगे.. http://aakashtiwaary.jagranjunction.com आकाश तिवारी

    rajeev dubey के द्वारा
    February 18, 2011

    आकाश जी, आपको लेख अच्छा लगा यह जानकर प्रसन्नता हुई. आभार .

kmmishra के द्वारा
February 18, 2011

याद रखो कि यह हम ही हैं जो इस जीवन चक्र का भोग करना चाहते हैं लेकिन भूल जाते हैं कि यह चक्र हमारे द्वारा ही रचा गया है। एक बार अपने आप को स्वीकार करो – पूर्ण रूप से, जीवन की हर वस्तु को , हर आश-निराश को और तुम पाओगे कि यह सारा जगत एक विचार मात्र है और जब तुम इस विचार पर और दृढ़ता से केंद्रित होगे तब मानों एक धमाके के साथ पता लगेगा…. एक अनोखी घटना घटेगी … तुम देख सकोगे कि तुम स्वयं ही व्याप्त हो हर ओर…ऐसी है सत्ता आत्म स्वीकृति की ! – अहं ब्रह्मास्मि । क्या बात है । ऐसा लगता है हर राष्ट्रवाद का प्रकाश ब्रह्म के सूर्य से प्रवाहित हो रहा है । यह अद्भुत है । आभार ।

    kmmishra के द्वारा
    February 18, 2011

    हर X

    rajeev dubey के द्वारा
    February 18, 2011

    मिश्रा जी, बहुत दिनों बाद आपकी प्रतिक्रिया पढ़ मन प्रसन्न हो गया . आभार. अंतःकरण से पुकार उठी है एक, जन जन के लिए कुछ कर जाने की लगन है, आइये यह यज्ञ सफल बनाते हैं …

    K M Mishra के द्वारा
    February 18, 2011

    राजीव जी, रात इस पहर में और अंधियारी हो गयी है लगता है सवेरा अब दूर नहीं ।

Alka Gupta के द्वारा
February 18, 2011

दुबे जी , हमारा पूरा जीवन चक्र हमारी सोच व इच्छाओं की धुरी पर ही घूमता रहता है और अंततः परिस्थितियों का वास्तविक रूप ले लेता हैघटनाएं घटित होने के बाद जब मन की गहराई में जाते हैं तो वे सभी विचार , सोच, इच्छाएं पुनः एक फिल्म की रील की तरह घूमते रहते हैं ! जीवन दर्शन से सम्बंधित बहुत ही अच्छी प्रस्तुति!

    rajeev dubey के द्वारा
    February 18, 2011

    अलका जी, आपके विचार सही दिशा में हैं, ध्यान व चिंतन अध्यात्मिक प्रगति की ओर ले जाते हैं.

Harish Bhatt के द्वारा
February 17, 2011

राजीव जी सादर प्रणाम, बहुत ही बेहतरीन लेख के लिए हार्दिक बधाई. सच में ऊपर से कुछ नहीं थोपा हुआ होता है. जैसा हमारा मन चाहता है वैसा ही होता जाता है और मानव स्वभाव के कारण दोष दुसरे को दे देते है.

    rajeevdubey के द्वारा
    February 17, 2011

    हरीश जी आपको भी मेरा सादर प्रणाम…प्रतिक्रिया के लिए आभार ………………….. विश्वं दर्पण दृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतम यथा निद्रया | . . sri dakshinamurti stotra (1) ……………………………………………………………………. ऐसा ही है जगत का विस्तार ….

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 17, 2011

सुंदर विचार सुंदर प्रस्तुति के माध्यम से……….. सार्थक प्रयास के लिए बधाई……

    rajeevdubey के द्वारा
    February 17, 2011

    पियूष जी, बहुत बहुत आभार…आपके नए लेख की प्रतीक्षा है.

rajkamal के द्वारा
February 17, 2011

प्रिय राजीव जी ….. नमस्कार ! आपका आज यह दार्शनिक रूप भी देखा …… अपनी बात बहुत ही बढ़िया ढंग से सुन्दर कहानी द्वारा समझाने की कोशिश की है आपने ,जिसमे की आप सफल भी हुए है ….

    rajeevdubey के द्वारा
    February 17, 2011

    राजकमल जी, यह तो आपकी शुभकामनाओं की सफलता है जो मेरी लेखनी आगे बढ़ती जाती है…पुनः आभार

priyasingh के द्वारा
February 17, 2011

सोचने को विवश कर देने वाली रचना ……..अंतिम पंक्तियों को पढ़कर मन में विचारो का मंथन शुरू हो गया ………. उत्तम प्रस्तुति……..

    rajeevdubey के द्वारा
    February 17, 2011

    प्रतिक्रया पर आभार प्रिया जी

allrounder के द्वारा
February 17, 2011

राजीव जी, एक बार फिर से आपने एक अत्यंत सुन्दर कहानी के साथ अपने विचारों की दार्शनिकता के दर्शन कराये उसके लिए आपका अभिनन्दन !

    rajeevdubey के द्वारा
    February 17, 2011

    सचिन जी, आपकी प्रतिक्रया पर आभार,… ……………………………………………….. अकथ अलौकिक तीरथराऊ | देई सद्य फल प्रगट प्रभाऊ | ……………………………………………….. यह तो तीर्थराज प्रयाग में बिताये समय का फल है कि लेखनी कुछ अध्यात्म चिंतन पर भी चल पडी…

rajnithakur के द्वारा
February 17, 2011

राजीव जी, हमारी इच्छाओं- विचारों बहुत शक्ति होती है. हम जो लगातार सोचते या चाहते है, धीरे धीरे वह हमारे अचेतन मस्तिष्क में चला जाता है और अचेतन मस्तिष्क की तरंगें ब्रह्माण्ड में व्याप्त विशिष्ट तरंगों से एकाकार होने लगती हैं…हमारी जैसी इच्छा या विचार होते है,धीरे धीरे उसी के अनुरूप हम स्वयं की परिस्थितियों का निर्माण कर बैठते हैं.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 17, 2011

    रजनी जी, आपके विचारों पर आभार….यदा चितिः प्रसरति तदाऽहन्ता जगद्भ्रम: (योगवासिष्ठ, निर्वाणप्रकरण उत्तरार्ध, ३२.१)


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