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हे ईश्वर ... क्या न तेरा अस्तित्व मिथ्या ?

Posted On: 16 Feb, 2011 में

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हे ईश्वर !

खोजता तुझे आज मैं साकार ।

 

करता जगत जब हाहाकार

तेरे रूप में होता विकार ।

 

तर्क के तीव्र बाणों से

जब बींधता हृदय काल

तब तेरे अस्तित्व का

दिखता मुझे अकाल ।

 

सत्य और चेतना के द्वार

खोल जब झाँकता

दिखता है मुझे क्यों

इस जगत का दीन आकार ?

 

धारित्री के सुखों का
उदघोष कर्म का सिद्धांत
बना दिखता है मुझे
हर प्राण में क्लांत ।

 

तब उठा इस दीनता के

प्रतीक  को जो है म्लान

क्यों न फेंकता है

हे जगत के मान !

 

सृष्टि को देकर आकार

क्या न आया तुझमें विकार ?

इच्छा रहित हे अविकार

क्या सृष्टि हुई अनिच्छित साकार ?

 

कर्म का फल यदि जीवन

तो कह किस कर्म हित प्रथम जीवन !

यों पूछता जब मुझसे मेरा मन

तो होता मेरे हृदय में कंपन !

 

सब माया है

तो सत्य है क्या ?

है जगत असत्य यदि

तो क्या न जगत विचार मिथ्या ?

 

तू भी विचार जगत का ही …

तो क्या न तेरा अस्तित्व मिथ्या !

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajkamal के द्वारा
February 17, 2011

प्रिय राजीव जी ….. नमस्कार ! बस इतना ही कह सकता हूँ की आपकी कविता और उसके भाव सुन्दर बन पड़े है ….. इश्वर के बारे में एक कवी और साधारण मनुष्य के विचार कभी भी समान होते हुए भी एक नही हो सकते है …..

    rajeev dubey के द्वारा
    February 19, 2011

    राजकमल जी, आप का बन्धु भाव है मुझसे और मनुज का मन तो प्रेम के धागों से बंधा होता है, भावों का सम्प्रेषण होता ही है, काव्य उन्हीं भावों की अभिव्यक्ति है…कभी मेरे द्वारा तो कभी आपके द्वारा….समय समय का खेल है….!

allrounder के द्वारा
February 17, 2011

राजीव जी नमस्कार एक अच्छी रचना पर बधाई ! ये सही है की इंसान को कई मर्तबा इश्वर के अस्तित्व मैं न होने का भ्रम होता है, मगर इश्वर का अस्तित्व है और इश्वर इंसान को एक क्षण मैं ही इसका आभास करा देता है, सिर्फ महसूस करने की आवश्यकता होती है ! दो पंक्तियाँ मेरी और से …. तू जाता है जिधर – जिधर वहां मेरा साया है, तू देख सकता नहीं मुझे पर, तेरी नजरों मैं तो बसी दुनिया की मोह – माया है !

    rajeevdubey के द्वारा
    February 17, 2011

    सचिन जी, आपकी बात में दम है… कवि ईश्वर को साकार खोज रहा है, वैचारिक इश्वर उसे दिख नहीं रहा …और शास्त्र के तर्क उसे संतुष्ट नहीं कर रहे….प्रतिक्रिया के लिए आभार ।

Rajni Thakur के द्वारा
February 17, 2011

राजीव जी , अध्यात्म के मर्मों से सिक्त बेहतरीन रचना…

    rajeev dubey के द्वारा
    February 17, 2011

    रजनी जी, यह जान हर्ष हुआ कि आपने काव्य के मर्म पर दृष्टि डाली … हार्दिक आभार

Alka Gupta के द्वारा
February 17, 2011

दुबे जी ,बहुत ही बढ़िया कविता है ! सुन्दर भाव व उच्च कोटि का काव्य-सृजन है आपका !

    rajeev dubey के द्वारा
    February 17, 2011

    अलका जी, आध्यात्मिक विषय पर लिखी गयी कविता के गुणी ग्राहक मिलना ही पुरूस्कार है मेरा … आपकी प्रतिक्रया पढ़ आनंद आया, आभार

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 17, 2011

श्री दूबे जी, बहुत ही उत्कृष्ट रचना…आपकी कला आपको बहुत आगे लेकर जायेगी.. आकाश तिवारी

    rajeev dubey के द्वारा
    February 17, 2011

    स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा …तो जब महाकवि तुलसी ही कह गए कि काव्य आतंरिक आनंद के लिए ही होता है…तो आगे तो इतना ही जाना है कि उस परमात्म तत्व में लीन हो जाऊं… ……………….. आपकी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार


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