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चलो आज देवों से पूछें ...

Posted On: 16 Feb, 2011 में

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चलो आज देवों से पूछें

वे क्यों कर मुस्काते हैं ?

पाषाणों में गढ़े हुए

वे क्या सुख पाते हैं ?

 

चन्दन  और पुष्पों से

मंदिर महकाये जाते हैं

प्रतिमाओं के आगे आ जन

नित नत मस्तक हो जाते हैं ।

तब क्या देख दीनता उनकी

देवगण हर्षित हो मुस्काते हैं !

 

प्रतिमाओं को गढ़ने वाले

जल से क्षुधा बुझाते हैं ।

पकवानों से पूजित हो

देव नमन को पाते हैं ।

 

लिए भाल पर श्रम के बिन्दु

वे कृषक खेत जोतने जाते हैं ।

वर्षा की बूँदों को ही पा

वे हर्षित हो गीत मधुर गाते हैं ।  

 

तेज़ धूप में फिर रक्तिम मुखमंडल ले

वे पूजा-गृह को आते हैं ।

दो पुष्प चढ़ा कृत कृत्य हुए

वे हर्षित हो आशा के संग घर जाते हैं ।

पर नहीं प्रश्न पूछने को

वे देवों को टेर लगाते हैं ।

 

ज्ञानीजन अपनी विद्या को

देवों की कृपा बताते हैं

पर विपदा के मारों को देव

कर्मों की राह दिखाते हैं ।

 

चलो आज देवों से पूछें

वे क्यों कर मुस्काते हैं ?

क्या रुदन और चीत्कारें सुन

नयन नीर न बरसाते हैं ?

 

पाषाणों में गढ़े देव

पाषाण-हृदय हो जाते हैं ।

इसीलिए  वे जगती के दुःख पर

चुपचाप खड़े मुस्काते हैं …!

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dharmesh Tiwari के द्वारा
February 17, 2011

राजीव जी नमस्कार,,,,,,,,,चलो आज देवों से पूछें वे क्यों कर मुस्काते हैं ? क्या रुदन और चीत्कारें सुन नयन नीर न बरसाते हैं ? ,,,,,,,,,,,,,,,,सुन्दर कविता,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,धन्यवाद!

    rajeev dubey के द्वारा
    February 17, 2011

    आपका बहुत बहुत आभार धर्मेश जी…

Amit Dehati के द्वारा
February 16, 2011

आदरणीय भ्राता श्री प्रणाम ! अतिसुन्दर प्रयाश ! आदरणीय दुबे जी आपके कविता में सच्चाई झलक रही हैं ……. मेरा भी प्रतिक्रिया कुबूल !!!!!! आपको बहुत बहुत बधाई| धन्यवाद ! http://amitdehati.jagranjunction.com/2011/02/12/%E0%A4%AD%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%AE-%E0%A4%86%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%93%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B8%E0%A4%9C%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8D/

    rajeevdubey के द्वारा
    February 17, 2011

    अमित जी, आभार.

Munish के द्वारा
February 16, 2011

राजीव जी, आपने बहुत अच्छी कविता लिखी है, लेकिन ये “देव” पत्थर ह्रदय कैसे हो सकते हैं जो स्वयं मूर्तिकारों की इतनी चोटें खाने के बाद भी मुस्करा रहे हैं, तो निश्चित ही देवों की मुस्कराहट ये सन्देश देती है की कितनी ही विपदा आये या चोटें सहनी पड़ें परन्तु हमें धर्य नहीं खोना चाहिए और मुस्कराते रहना चाहिए http://munish.jagranjunction.com/2011/02/15/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82/

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    मुनीष जी, जब इंसान स्वयं अपने साथ कोई कुछ बुरा न करे ऐसी इच्छा रखने के बाद भी दूसरों के साथ बुरा कर सकते हैं…तब… यह तो बस पाषाणों में मनुष्य द्वारा उकेरे गए बिम्बों की गाथा है … कविता तो यही कहती है…प्रतिक्रिया पर बहुत बहुत आभार

rajkamal के द्वारा
February 16, 2011

प्रिय राजीव जी ….नमस्कार ! मैं आपकी कविता के आखरी भाव से सहमत नही हूँ ….. कुछ अर्ज करना चाहता हूँ :- \"गर इंसान जो कुछ चाहता वोह सभी उसको मिल गया होता तो आज आदमी खुदा होता और खुदा \’खुदा \’ ना होकर ना जाने क्या होता\" …..

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    राजकमल जी, अरे यह तो कुछ भी नहीं है, एक और असहमतिपरक कविता आने वाली है….प्रतिक्रिया के लिए आभार…!

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 16, 2011

देश में व्याप्त व्यथा का सुन्दर चित्रण किया है आपने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में… बहुत अच्छे राजीव जी,

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    वाहिद जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार…

Dr Venkat Iyer के द्वारा
February 16, 2011

वा वा कय बात कही है …….

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    डॉ. वेंकट साहब, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार…कविता अच्छी लगी यह जान प्रसन्नता हुई …

priyasingh के द्वारा
February 16, 2011

पाषाणों में गढ़े देव पाषण ह्रदय हो जाते है ………… इसलिए वे धरती के दुःख पर चुपचाप खड़े मुस्काते है …. बहुत अच्छी रचना, उत्तम प्रस्तुति …….शब्दों का अच्छा संयोजन …………

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    प्रिया जी, रचना पसंद आयी यह जान अच्छा लगा, आभार

आर.एन. शाही के द्वारा
February 16, 2011

अर्थपूर्ण रचना राजीव जी … बधाई ।

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    शाही जी, प्रतिक्रया के लिए आभार… जल्दी ही एक कहानी प्रस्तुत कर रहा हूँ मंच पर…

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 16, 2011

पाषाणों में गढ़े देव पाषाण-हृदय हो जाते हैं । इसीलिए वे जगती के दुःख पर चुपचाप खड़े मुस्काते हैं …! राजीव जी खूबसूरत भावों से सजी इस रचना के लिए बधाई……..

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    पियूष जी, आभार

Alka Gupta के द्वारा
February 16, 2011

दुबे जी , भाव प्रधान सर्वोत्कृष्ट रचना ! बहुत ही सुन्दर है !

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    अलका जी, आपकी सहृदयता पूर्ण प्रतिक्रया पर बहुत आभार

Deepak Sahu के द्वारा
February 16, 2011

राजीव जी! सुंदर कविता आपकी! बधाई! http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com/2011/02/09/valentine-contest/

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    दीपक जी, प्रतिक्रिया पर बहुत बहुत आभार…आपको अपने लेखों पर नियमित प्रतिक्रिया देते देख मन प्रसन्न हो उठता है…


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