लोकतंत्र

© Rajeev Dubey (All rights reserved)

44 Posts

673 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3672 postid : 205

पिघल उठी मंदिर की मूरत

Posted On: 15 Feb, 2011 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

शांत, स्निग्ध, और दिव्य आभा से पूर्ण थी मंदिर की वह मूरत ।

 

विकल हृदय ले दर्शन करने आने वाले शांत हृदय ले वापस जाते थे ।

 

पर उस प्रातः घटित हुआ वह अकल्पित … ।

 

वे मंदिर को जाने वाले पग वापस दौड़े आते थे ।

 

पिघल उठी थी जगती की घृणा से मंदिर की वह मूरत ।

 

और बन अपार समुद्र पथ  पर बहती आती थी ।

 

क्यों हुआ, क्यों हुआ – मूरत का शांत हृदय विकृत ?

 

जन धारा पथ पर यही सोचती भागी जाती थी ।

 

कोई न बचता था उस प्रवाह से सब नष्ट हुआ जाता था ।

 

समस्त जगत का आक्रोश मानो वहाँ अभिव्यक्ति पाता था ।

 

उस धारा के गर्जन से हृदय काँप काँप रह जाता था ।

 

नहीं-नहीं अब कुछ न बचेगा, यह सोच मन डूबा जाता था ।

 

पर तभी हुआ सब कुछ परिवर्तित…  ।

 

वह विकराल दृश्य अब नज़र न आता था ।

 

स्वप्न था – दुःस्वप्न था यह सोच मन संतुष्टि पाता था ।

 

पर क्यों दिखा यह स्वप्न – क्या यही भविष्य सभ्यता का ?

 

देव भी जब सह न सकेंगे गरल मनुज मन का !

 

ढह जाएँगे क्या विश्वास सारे जन मन के ?

 

क्या प्रलय के दृश्य होंगे साक्षी अंततः सृष्टि के !

| NEXT



Tags:         

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

12 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajkamal के द्वारा
February 16, 2011

प्रिय राजीव जी …. नमस्कार ! हमे भगवान कल्कि जी के अवतार लेने पर पूर्ण विश्वाश है ….. जिस दिन वोह इस धरा पर अवतरित होंगे उस दिन किसी मूर्ति की अराधना करने की जरूरत नही रहेगी

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 16, 2011

अगर हम न चेते तो ये सच भी हो सकता है. भविष्य के संभाव्य हालात पर आपने सटीक दृष्टिपात किया है. आभार,

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 16, 2011

राजीव जी …… सुंदर प्रस्तुति के लिए बधाई……..

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    पियूष जी, प्रतिक्रया के लिए आभार.

Alka Gupta के द्वारा
February 16, 2011

दुबे जी, सभ्यता के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगाती हुई उत्कृष्ट रचना !

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    अलका जी, हाँ सभ्यता को अपने क्रिया कलापों और अपनी भाव तथा गति की दिशा पर विचार करना होगा …आभार

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 16, 2011

देव भी न सह सकेंगे गरल मनुज मन का…. दुबे जी आपने उचित ही फ़रमाया है… एक अच्छी रचना… आभार…. एक नज़र इधर भी डालियेगा http://himanshudsp.jagranjunction.com/2011/02/16/an-appeal/ आपके आशीर्वचनो का आकांक्षी….

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    हिमांशु जी, आभार…आशा है आपने अपने लेख पर मेरी प्रतिक्रिया देखी होगी…

deepak pandey के द्वारा
February 16, 2011

राजीव जी, बहुत ही सुन्दर कविता.

    rajeevdubey के द्वारा
    February 16, 2011

    दीपक जी आपकी प्रतिक्रया पर आभार…

nishamittal के द्वारा
February 16, 2011

दुबे जी,अभिवादन,हिंसा,अराजकता,निरंकुशता आदि कुप्रवृत्तियों से भरपूर इस जग के भयावह भावी स्वरूप का दर्शन करती आपकी पंक्तियाँ.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 16, 2011

    निशा जी , आभार…


topic of the week



latest from jagran