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तुम्हारे लिए

Posted On: 14 Feb, 2011 में

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मैंने तो बहुत चाहा था
कि तुम्हें रोक लेता उस शाम
पर मन की बात
होठों तक आ न सकी |

 

काश कि  तुमने देखा होता
मेरी आँखों में
ठहर कर दो पल
बस दो पल |

 

मैंने चाहा था
उस दोपहरी
जब सड़कें भी बिलकुल सुनीं थीं
की खटकाओ तुम द्वार मेरा |

 

और आकर बैठो
चुप-चाप
कुछ पल
मेरे आँगन में |

 

मेरे ये सपने रखे हैं
अभी भी वैसे ही
अनछुए…
तुम्हारे लिए – बस तुम्हारे लिए |

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 16, 2011

आदरणीय राजीव भईया, विलंबित उपस्थिति के लिए क्षमा करें. व्यस्त था किन्तु ‘मन की बात होठों पर आ गयी…” क्या करूँ विरोधाभास अलंकार बहुत प्रिय है… साभार,

    rajeev dubey के द्वारा
    February 16, 2011

    वाहिद जी, आपका सदैव स्वागत है…जीवन है ही ऐसा…इसीलिये तो यह संसार कहलाता है…आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार

Deepak Sahu के द्वारा
February 15, 2011

राजीव जी! सुंदर पंक्तियाँ! बधाई

    rajeev dubey के द्वारा
    February 16, 2011

    धन्यवाद दीपक जी…

Dharmesh Tiwari के द्वारा
February 15, 2011

राजीव जी नमस्कार,वाक्य्यी इंतजार करना आसान नहीं होता,काफी मार्मिक प्रस्तुती,धन्यवाद!

    rajeev dubey के द्वारा
    February 16, 2011

    हाँ धर्मेश जी, इंतज़ार करने वाले के लिए पल पल भारी होता है …

Amit Dehati के द्वारा
February 15, 2011

दुबे जी बहुत सुन्दर kavita ………….संदेशप्रद सुन्दर कविता के लिए बधाई ! http://amitdehati.jagranjunction.com

    rajeev dubey के द्वारा
    February 16, 2011

    अमित जी, आभार

rajkamal के द्वारा
February 14, 2011

न उसने रोका न मुझको बुलाया मैं आहिस्ता -२ आगे ही बढ़ता ही आया यहाँ तक की उससे जुदा हो गया मैं …. प्रिय राजीव जी …नमस्कार ! आप की इस मार्मिक कविता ने रफ़ी साहब का यह गाना याद दिला दिया मुझको …. आभार व् शुभकामनाये

    rajeev dubey के द्वारा
    February 14, 2011

    राजकमल जी, अपने मन प्रसन्न कर दिया, कोई पुरानी डोर बंधी है आपके साथ…आभार.

nishamittal के द्वारा
February 14, 2011

बहुत ही सुंदर भावों से भरपूर सामयिक रचना दुबे जी.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 14, 2011

    निशा जी, आपकी प्रतिक्रिया पर हार्दिक धन्यवाद.


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