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थोड़ा हँस के देखो ...

Posted On: 8 Feb, 2011 में

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अकथ्य कथा बने तुम कब तक चलते जाओगे -
कब तक यूँ स्वप्नों की गठरी ले मन को भटकाओगे ?

 

मैं देख रहा सितारे कब से – ये यूँ ही चमक रहे -
तुम कब तक इनकी चाह लिए ऊँचे चढ़ते जाओगे !

 

ये देखो मेघ घुमड़-घुमड़ कर धरती पर बरस चले…
कुछ बूँदों को पा कर पत्ते देखो कैसे चमके !

 

फिर भी तुम, इन सबके बीच, चुपचाप चले जाओगे -
आकांक्षाओं के बोझ तले कब तक खुद को तरसाओगे ?

 

थोड़े से आँसू और थोड़ी सी खिली हुई हँसी…
इन सबको ठुकरा कर अब तुम कितना पाओगे ?

 

बोलो कब तक तुम यूँ ही व्यथित रहोगे -
थोड़ा हँस के देखो अद्भुत सुख पाओगे !

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

roshni के द्वारा
February 9, 2011

राजीव जी थोड़े से आँसू और थोड़ी सी खिली हुई हँसी… इन सबको ठुकरा कर अब तुम कितना पाओगे… बहुत सुंदर कविता

    rajeevdubey के द्वारा
    February 9, 2011

    रोशनी जी, धन्यवाद आपका….आप सबका प्यार और सद्भावना है जो कवितायेँ अपने आप ही बह निकलतीं हैं…

deepak pandey के द्वारा
February 9, 2011

राजीव जी , आप अच्छे कवी हैं.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 9, 2011

    दीपक जी, कवि तो कविता के जानने वालों से बनता है, जितने बड़े कविता के पारखी गुणी जन होते हैं, कवि उतना ही निखर जाता है…तो यह तो आप गुणी जनों का प्रताप है जो मैं अपनी कवितायेँ प्रस्तुत कर पा रहा हूँ और प्रेरणा भी पा रहा हूँ , प्रतिक्रिया के लिए आभार.

rajni thakur के द्वारा
February 9, 2011

राजीव जी, प्रेरणा की तारीफ करनी होगी, जिनकी मुस्कराहट के लिए इतनी सुन्दर पंक्तियाँ रच दी आपने.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 9, 2011

    रजनी जी, आपको कविता पसंद आयी यही सबसे बड़ी बात है…कोशिश करूंगा और सुन्दर कवितायेँ लिखूं और मंच पर सभी के मन में थोड़ी ही सही, खुशी बिखेरूं ..

Deepak Sahu के द्वारा
February 9, 2011

राजीव जी! सुंदर पंक्तियाँ है आपकी! बधाई

    rajeev dubey के द्वारा
    February 9, 2011

    दीपक जी, प्रतिक्रिया पर आभार…

vinitashukla के द्वारा
February 9, 2011

सही कहा आपने दुबे जी. जीवन में हंसी ख़ुशी के दो पल तो होने ही चाहियें.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 9, 2011

    जी हाँ, और खुशी एक उपहार होती है इश्वर का, यदि हम उसे संजो कर रखते हैं, तो इश्वर हमें थोड़ी और देता है, फिर यदि हम उसे बाँटते भी हैं, तो कहना ही क्या, खुशियों की फुहारें पड़ने लगती हैं….! इसलिए कहा , जैसा भी जीवन हो, थोडा ही सही, हँस कर तो देखो…


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