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काल गाथा

Posted On: 8 Feb, 2011 में

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जरा ध्यान से देखो …
न जाने किन किन दिशाओं से,
आती हुई अनगिन जीवन धाराएँ ,
अद्भुत रूप लेती जा रही हैं |

 

वे तरंगित – करती अठखेलियाँ ,
गुजर रही हैं अजब मोड़ों से ,
करती उत्पन्न स्वरों की सरिता,
आरोपित हैं एक दूसरे पर |

 

अनजान आयामों से आते,
जीवन के प्रतीक प्रकाश-पुंज ,
मिल रहे हैं विभिन्न रूपों में,
और बन रहे हैं रंग नए|

 

फिर हो रहे हैं प्रवाह,
और नई-नई दिशाओं में,
फिर खोते जा रहे हैं सभी,
मिलने को शायद फिर कभी|

 

फिर बन रहे हैं वे देखो,
तारागण – नई आकाशगंगाएं ,
फिर हो रहे हैं श्रृष्टि के गान,
फिर मुखरित होते प्राण |

 

हर अवसान होता घटित है,
बन प्रतीक किसी उत्थान का,
बन जाते हैं बुझते दीप,
नई शिखाओं के उत्प्रेरक|

 

पवन का प्रचंड वेग कहीं,
सूर्य का कहीं उत्ताप,
सब काल के खण्डों में,
घटित होते प्रवेग |

 

उठाई जा रही हैं शपथें,
कहीं पतनोन्मुख कोई,
और अनंत काल के प्रवाह में
विलीन हो जायेंगे सभी |

 

फिर लिखी जा रही हैं
रची जाती कथाएं नई
फिर कहीं सुदूर उठती पुकारें
दिशाओं में खो रही आवाजें |

 

आंसुओं में भीगी आँखें वे देखो,
इन व्यथाओं को क्या कहो,
टूटे हुए मनों की पीड़ाएँ,
या पनप रहे राग नए !

 

खंडहरों के गूंजते हिस्से,
या चमकते शिखर नए,
सब कहते कथा एक ही,
गुजरते हुए पलों की गति…!

| NEXT



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vinitashukla के द्वारा
February 9, 2011

परिवर्तन ही जीवन का शाश्वत सत्य है. काल के प्रवाह से कोई नहीं बच पाया. सुन्दर रचना के लिए बधाई.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 9, 2011

    हाँ विनीता जी, और परिवर्तन को रोकने का प्रयास ही दुःख का कारण है…

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 8, 2011

राजीव जी…… हर बार आप एक खूबसूरत रचना से अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करने मे सफल होते है……. आपकी इस सुंदर रचना के लिए बधाई…….

    rajeev dubey के द्वारा
    February 9, 2011

    पियूष जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार और प्रिय जनों का ध्यान जितना मिले उतना ही ज्यादा मन प्रसन्न रहता है…

NIKHIL PANDEY के द्वारा
February 8, 2011

राजीव जी आप सामान्य रचनाकार नहीं है .. आपकी पंक्तिया इतनी अर्थपूर्ण है और उनमे इतनी गहरी है की उन्हें समझना और सोचना दोनों एक साथ करना पड़ता है…. बहुत गहराई है कविता में .. बहुत अच्छी लगी ये कविता ..

    rajeevdubey के द्वारा
    February 8, 2011

    निखिल जी, सच तो यह है की आप सभी बड़े ही गुणी जन हैं. जब कि सर्वत्र इस बात पर लिखा जा रहा है कि युवा वर्ग भारतीय चिंतन और संस्कृति से विमुख हो रहा है, तब, मैं दावे की साथ कह सकता हूँ कि ऐसा कहना गलत है. मेरे इस गौरवशाली देश के युवा बड़े ही होनहार हैं और राष्ट्र की बागडोर उनके हाथों में सुरक्षित रहेगी. जब आप लोग काल की व्याख्या में लिखी गयी कवितायेँ पढ़ सकते हैं और उन पर चिंतन कर सकते हैं तो मैं निश्चित ही यह कह सकता हूँ कि यह देश अभी भी जीवंत और शक्तिशाली है….आपकी प्रतिक्रया पर आभार .

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 8, 2011

काल की अनन्तता की व्याख्या करती खूबसूरत रचना बहुत ही अच्छी लगी|

    rajeev dubey के द्वारा
    February 8, 2011

    वाहिद जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार. आपसे एक काम था काशी में…वाराणसी के प्रमुख संस्कृत ग्रंथों की दुकानों जैसे चौखंभा प्रकाशन, तारा , और जो भी मुख्य हों, इनका फ़ोन नंबर चाहिए था…यदि कभी समय मिले तो भेजिएगा…आभार.

rajni thakur के द्वारा
February 8, 2011

राजीव जी, काल की प्रचंड शक्ति को उद्घाटित करती एक बेहतरीन रचना. साधुवाद.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 8, 2011

    रजनी जी आपका तो विषय ही कालचक्र के अन्दर झांकने का है …प्रतिक्रिया के लिए आभार…

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 8, 2011

दुबे जी…… नमस्कार……. एक और सुंदर रचना प्रस्तुत करने के लिए आपको बधाई……………

    rajeev dubey के द्वारा
    February 8, 2011

    धन्यवाद हिमांशु जी.

rajkamal के द्वारा
February 8, 2011

सच ही कहा गया है कि काल बड़ा ही बलवान है

    rajeev dubey के द्वारा
    February 8, 2011

    हाँ राजकमल जी, आदि शंकर के भज गोविन्दम में यह श्लोक देखिएगा: दिनयामिन्यौ सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः | कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुञ्च्त्याशावायुः || (12)


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