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एक संध्या...

Posted On: 7 Feb, 2011 में

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एक संध्या वह विस्तृत नभ ठहर गया आँखों में ,
छोटे-छोटे पंख लगा मन छोड़ चला तन को,
तब फूट पड़े गीत कोई रस घोल गया कर्णों में ,
रंगों भरे बादल पर बैठ लगी धरा मधुर उसको |
उड़ते-उड़ते दिख गए उसको चमकीले नयन कोई,
किसी मधुर आभा का आमंत्रण ले गया खींच कहीं |
वह भटक-भटक कर भी रस विभोर उड़ता गया ,
इन्द्रधनुषी रंगों से स्वप्नों को भर खो गया कहीं |

 

एक संध्या कुछ बूँदें टपक पड़ीं नभ से ,
तो पूछ लिया कैसी हो धीरे से धरा ने ?
वे मुस्कुरा पड़ीं और फ़ैल गयी सोंधी महक हवा में…
उसी संध्या लुढ़के कुछ अश्रु नयनों से -
वे खारे थे, न किसी के अपने, अनजाने रह गए,
पर स्वप्न सजीले थे, रुक न सके रोके, रंगों से फ़ैल गए|
उन गीली आँखों में भी वे नौका बन तैर गए
चुनते रहे उस रात वे ओस की बूंदों को |

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhagwan Babu के द्वारा
February 8, 2011

सुन्दर, सीधी, सलोनी मगर गहरे भाव लिये कविता शुभकामनायें http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2011/02/07/%e0%a4%b8%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e2%80%93-valentine-contest/

    rajeev dubey के द्वारा
    February 9, 2011

    भगवान जी, आपको कविता पसंद आयी यह जान कर अच्छा लगा, आभार.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 8, 2011

सुन्दर शब्दों में सारगर्भित कृति की प्रशंसा के लिए शब्द ही नहीं सूझ रहे|फिर भी मुबारक हो|

    rajeev dubey के द्वारा
    February 9, 2011

    धन्यवाद वाहिद जी…

abodhbaalak के द्वारा
February 8, 2011

अपने आप में बहुत गहराई लिए हुई रचना ….. राजीव जी आपने अपने कलम से (कीबोर्ड से) एक और बहुत ही ….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    rajeev dubey के द्वारा
    February 9, 2011

    अबोध जी, आभार.

rajkamal के द्वारा
February 8, 2011

प्रिय राजीव जी …… नीर और जल पर एक बहुत ही सुंदर कविता गंभीर अर्थ लिए हुए धन्यवाद

    rajeev dubey के द्वारा
    February 9, 2011

    राजकमल जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार.


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