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गुनगुना पड़ा मन ...

Posted On: 6 Feb, 2011 में

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फिर खिल उठे फूल,
और मुस्कुरा दी धूप,
जानते हो कैसे ?
कोइ हँस पड़ा हो जैसे !

 

रुक गयी हैं सिसकियाँ,
और सूख गए आँसू,
सोचो जरा फिर से -
बादल बरस चुके हों जैसे !

 

खुले हुए नयन -
झपक गए हों जैसे,
बादल घिर गए हैं ऐसे,
सूरज छुप गया है ऐसे |

 

फिर बह चली यह नौका,
लो उठी फिर तरंगें,
पग बढ़ चले हों जैसे,
मन खिल उठा हो जैसे |

 

आ पडी हैं कुछ बूँदें -
सूखी हुई धरा पर
सुन कर नए गीत ,
गुनगुना पड़ा मन ऐसे !

 

छू गयी उंगलियाँ जब
थिरक उठे कदम यूं
पंछी  उड़ चले हों जैसे
उपवन झूम उठा हो जैसे …!

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

roshni के द्वारा
February 8, 2011

राजीव जी फिर से एक और नयी सुंदर रचना वाह

    rajeev dubey के द्वारा
    February 9, 2011

    रोशनी जी, प्रसन्नतापूर्ण अभिव्यक्ति के लिए आभार…

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 7, 2011

प्रिय राजीव जी, उपमा अलंकार का सुन्दर प्रयोग किया है आपने|आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है.. साभार,

    rajeev dubey के द्वारा
    February 7, 2011

    वाहिद जी, पूरी प्रकृति सदैव कुछ न कुछ सिखाती रहती है…आपकी जैसी खुली आँखें और विश्लेषण करने वाली बुद्धि हो तो कहना ही क्या, मैं तो बस जो महाकवि लोग लिख गए हैं उसमें से थोड़ा ही सीख पाया हूँ अब तक …

Bhagwan Babu के द्वारा
February 7, 2011
    rajeev dubey के द्वारा
    February 7, 2011

    आभार आपका भगवान जी

R K KHURANA के द्वारा
February 7, 2011

प्रिय राजीव जी, सुंदर कविता खुराना

    rajeev dubey के द्वारा
    February 7, 2011

    खुराना जी, आपकी प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद.

NIKHIL PANDEY के द्वारा
February 7, 2011

राजीव जी सुन्दर रचना है ..बधाई

    rajeev dubey के द्वारा
    February 7, 2011

    निखिल जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका आभारी हूँ मैं…आशा है भविष्य में भी आपको पसंद आयें ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत कर पाऊंगा .

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 6, 2011

हर बार की तरह के ओर खूबसूरत रचना के लिए बधाई………

    rajeev dubey के द्वारा
    February 7, 2011

    पियूष जी, आप का बहुत प्रेम है मुझ पर, आभार …

RajniThakur के द्वारा
February 6, 2011

..एक बेहतरीन कविता..आप तो लेखन की हर विधा में पारंगत लगते हैं राजीव जी .

    rajeev dubey के द्वारा
    February 7, 2011

    रजनी जी, पहले तो आपकी प्रतिक्रया के लिए आभार. मैं पारंगत नहीं हूँ, यह तो आप लोगों का प्रेम है जो आप सबको मेरे रचनाएँ अच्छी लगती हैं ….और मुझे आप सबके लिए लिखना अच्छा लगता है …बस यही सच है

    rajeev dubey के द्वारा
    February 7, 2011

    अतुल जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार. होली पर जरूर रंग बिखेरूँगा – आशा है आप सबको पसंद आयेंगे. फिल्मी कहानी पर आमंत्रण के लिए भी धन्यवाद.

abodhbaalak के द्वारा
February 6, 2011

Rajeev ji bahut hi sundar rachna, kuchh alag hi rang me … कान्टेस्ट के लिए मेरी शुभकामनाएं http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    rajeevdubey के द्वारा
    February 6, 2011

    अब मैं किस नाम से पुकारूं आपको…? अपना नाम लिखियेगा, आपकी प्रतिक्रया पा कर प्रसन्नता हुई. अच्छे पाठक अच्छी रचनाओं को प्रस्तुत करने के लिए प्रेरणा देते हैं…हाँ रंग अलग तो है, बसंत पंचमी निकट है, होली भी आयेगी, तो क्यों न कुछ नए रंग प्रस्तुत किये जाएँ, इस कांटेस्ट के बहाने से ही सही …!

    rajkamal के द्वारा
    February 6, 2011

    प्रिय राजीव जी ..नमस्कार ! हम इनको अबोध कहते है …. अगर आप चाहे तो सुबोध भी कह सकते है …. ******************************************************************* सिर्फ उंगलिया छूने से यह हाल हो गया है …. अगर पूरा बदन छू गया तो फिर तो राम जाने कोई महाकाव्य ही पढ़ने को मिलेगा हमको

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    राजकमल जी, बस तब तो आप तैयारी कर ही लीजिये…! बहुत बहुत आभार आपका…और अबोध जी को मैं भी उनके बहुचर्चित नाम से ही पुकारूंगा.


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