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दिल की बातें - कुछ यादें, कुछ आंसू ....

Posted On: 6 Feb, 2011 में

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हमने तो सदाएं बहुत दी थीं
पर वे सब लौट आयीं
इस ठंड में ठिठुरती
शायद उनकी गली का हर दरवाज़ा बंद था…!
…………………………………………………………..
इस जिन्दगी में हँसने के लम्हे
पहिले ही इतने कम हैं
और एक तुम हो कि बरस दर बरस
चुपचाप जिए जाते हो |
…………………………………………………………….
उम्मीदों को इतना भी न बढ़ाओ
कि जिन्दगी एक मुसीबत बन जाये !
……………………………………………………………..
हमने तो जिन्दगी में वो दिन भी देखे हैं
जब अपना ही साया साथ छोड़ जाता है
इसलिए ऐ दोस्त ! बेफिक्र रहना -
शिकायत भरी आवाजें इस ओर से न आयेंगी !
…………………………………………………………….
अभी मत आवाज़ दो, सोने दो मुझे
जो जाग गया तो फिर याद आयेगी ….|
……………………………………………………………..
दिल के अँधेरे इतने घने हो गए हैं
कि अब तेज़ धूप में भी छाँव की दरकार नहीं होती |
…………………………………………………………………..
खो दिए हैं हमने इस शहर में
खुशियों के अनमोल खजाने
अब वक्त माँगता है हिसाब
मैं क्या करूँ ?
………………………………………………………………..
कोई छाँह नहीं, कोई सहारा नहीं
जिन्दगी इस शहर में कोई तुम्हारा नहीं |
………………………………………………………………..
इन रास्तों पर मत आओ
यहाँ तो हम हैं
तेज हवाएं हैं
और दिल में एक घाव है |
………………………………………………………………..
कहने को तो अब हम भी हँस लेते हैं महफ़िलों में
पर ऐ ज़माने जो घाव तूने दिए, हम भूले नहीं हैं !
………………………………………………………………..
वो काफिले सजाते रहे
और हम करते रहे इंतजार
पर अफ़सोस – वक्त को न थी किसी की परवाह
वह तो दूरियां और बढ़ा गया |
………………………………………………………………..
वक्त तू क्यों इतना विरोधी है -
करता है सांठ गाँठ हवा के हर झोंके से,
कि बन थपेड़ा वह मुझे चोट पहुंचाए,
जिन्दगी के हर मोड़ पर -
तू मुझे कठिन राहें दिखाए,
वक्त तू क्यों इतना विरोधी है !
……………………………………………………………….
कुछ संग छोड़ गए
कुछ बने विरोधी
और कुछ बन अजनबी
चुप साध गए |
क्या जाने कैसी भूल हुई
कि हम सब कुछ ही हार गए !
………………………………………………………………
अकेले ही अकेले हम
न जाने कहाँ आ गए
हमने तो न तमन्ना की थी
यूं सूनी रातों को जीने की !
……………………………………………….. …………….
अपने अपने दुःख
प्रतीक्षाओं के लम्बे अन्तराल
पतझड़ के मौसम
पत्ते धूल में लावारिस
तेज़ अंधड़
सूनी आँखें
कदाचित यह था अपर्याप्त -
तभी तो रे मन
तू भी टूट गया !
…………………………………………………..
पथराई आँखें शून्य तकतीं
मन में अबुझ प्यास
सूखे होंठ
ये तेज़ हवाएं
लड़खड़ाते कदम
अनजान राहें
अजनबी चेहरे
नियति ! मैंने ऐसा क्या बिगाड़ा था
जो इस मोड़ पर ले आयी !
………………………………………………………..
मत रो, रे मन, तू बात बात पर
हर बात यहाँ पर कडुवी है
चुपचाप चला चल तेज़ धूप में
हर छांह यहाँ पराई सी है |
…………………………………………………………
एक शाम और गुज़र रही है
तन्हा – तन्हा |
सौंप दिए हैं
उसने
सारे रंग
अपने
न जाने किसको ?
मेरे हिस्से में आयी है
फिर से
रात की कालिमा |
जीना है मुझे
एक बार और
सुबह का
करते हुए
इंतजार… |
………………………………………….
वक्त विरोधी है
पर नहीं दुश्मन
जल्दी ही बदलेंगे दिन |

मत तौलो मुझको
इन विपरीत दिनों में
पछताओगे |

जल्दी ही फिर उठ बैठूंगा
यह ठोकर क्या चीज़ है
मैं फिर जीतूंगा….!
………………………………………………………

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 7, 2011

आप जो भी लिखते हैं उससे हृदय प्रफुल्लित हो जाता है और आजकल आपकी सक्रियता देख कर प्रसन्नता भी हो रही है| सुन्दर शब्दों के लिए शुक्रिया,

    rajeevdubey के द्वारा
    February 9, 2011

    वाहिद जी, यह तो बड़ी प्यारी बात कह दी आपने…आभार

Harish Bhatt के द्वारा
February 7, 2011

राजीव जी प्रणाम. वक्त विरोधी है, पर नहीं दुश्मन जल्दी ही बदलेंगे दिन | मत तौलो मुझको इन विपरीत दिनों में पछताओगे | जल्दी ही फिर उठ बैठूंगा यह ठोकर क्या चीज़ है मैं फिर जीतूंगा….! वाह क्या बात है दिल जीत लिया आपने. बहुत ही अच्छी कविता के हार्दिक बधाई.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 7, 2011

    हरीश जी, आपको भी प्रणाम . आपके दिल में मेरी जगह है यह एक अनूठा उपहार है मेरे लिए . आभार

Bhagwan Babu के द्वारा
February 6, 2011

अर्ज किया है – कुछ दर्द दबा है वीराने में कुछ सर्द हवा है उन राहो में जब सर्द हवाये चलती है वीराने में फिर दर्द सदाये देता है उन राहो मे http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2011/02/06/%e0%a4%89%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%87-%e2%80%93-valentine-contest/

    rajeev dubey के द्वारा
    February 7, 2011

    भगवान जी, आपके पास तो ऐसा नाम ही है कि सृजन शक्ति प्राप्त होनी ही थी. प्रतिक्रिया के लिए आभार.

rajkamal के द्वारा
February 6, 2011

हमने तो जिन्दगी में वो दिन भी देखे हैं जब अपना ही साया साथ छोड़ जाता है इसलिए ऐ दोस्त ! बेफिक्र रहना – शिकायत भरी आवाजें इस ओर से न आयेंगी ! *********************************************************** मत तौलो मुझको इन विपरीत दिनों में पछताओगे | जल्दी ही फिर उठ बैठूंगा यह ठोकर क्या चीज़ है मैं फिर जीतूंगा….! priy rajiv ji …… nmskaar ! बहुत ही बढ़िया भावों को खुद में समेटे हुए है आपकी यह कविता …. बधाईयाँ

    rajeev dubey के द्वारा
    February 7, 2011

    राजकमल जी, नमस्कार…आपको पसंद यह जानकर बड़ी खुशी हुई…बहुत बहुत आभार .

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 6, 2011

कोई छाँह नहीं, कोई सहारा नहीं जिन्दगी इस शहर में कोई तुम्हारा नहीं | गहरे भाव से भरी रचना…….. बधाई.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 7, 2011

    पियूष जी, हाँ कुछ गहरे पलों में निकले थे यह उदगार …, आपका आभार


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