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कागज़ की नाव

Posted On: 5 Feb, 2011 में

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मैं खोजता तुम्हें रहा…
पर तुम मिली न मुझको |

 

काश तुम मिलती तो बताता
कल शाम बादलों में कितने रंग घुले थे !

 

मैं जब सुबह नदी के इस पार उतरा
तब वह किनारा कितनी… दूर था !

 

कि  गुब्बारे जो बचपन में हमने देखे
उनके रंग अभी भी उतने ही प्यारे हैं |

 

और चाँद को देखकर अभी भी बच्चे
कहानियाँ गुनते हैं |

 

पर तुम न मिली
मैंने कितना खोजा हर रोज़ तुम्हें …!

 

आज शाम फिर नदी के किनारे
मैं अकेला ही गया |

 

धीमे धीमे शाम ढल गयी
और मैं चुपचाप बैठा रहा |

 

फिर नदी के पानी में
चाँद की छवि उतर आई |

 

मुझे लगा तुम भी कहीं बैठी होगी
नदी के किनारे …|

 

मैंने छोड़ दी एक नाव कागज़ की
पानी में धीरे से |

 

पहुंचे जो तुम तक
तो जान लेना – खोज रहा हूँ मैं तुम्हें यहाँ …|

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sumityadav के द्वारा
February 6, 2011

आपके कागज के नाव पर सफर करके बहुत अच्छा लगा। बहुत खूबसूरत प्रस्तुति खासकर ये लाइनें दिल छू गई- मुझे लगा तुम भी कहीं बैठी होगी नदी के किनारे …| मैंने छोड़ दी एक नाव कागज़ की पानी में धीरे से | पहुंचे जो तुम तक तो जान लेना – खोज रहा हूँ मैं तुम्हें यहाँ …| वेलेंटाइन कांटेस्ट के लिए बधाई।

    rajeev dubey के द्वारा
    February 7, 2011

    सुमित जी, वह कागज़ की नाव तो आप सबकी है…सफ़र अच्छा रहा यह खुशी की बात है, आशा है यह आपको आपके मुकाम तक जरूर ले जायेगी…आभार

Deepak Sahu के द्वारा
February 6, 2011

राजीव जी सुंदर रचना प्रस्तुत किया आपने !  कॉन्टेस्ट के लिए शुभकामनाएँ!  एक नजर इधर डालकर अपना आशीर्वाद प्रदान करे- http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com/2011/02/05/%E0%A4%95%E0%A4%A0%E0%A4%BF%E0%A4%A8-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%A1%E0%A4%97%E0%A4%B0-%E0%A4%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AF%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A4%B0-valentine-c/ दीपक

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    अहो, आभार! जरूर, जरूर, मैं जल्दी ही प्रतिक्रिया दर्ज करूँगा आपकी रचना पर

Bhagwan Babu के द्वारा
February 6, 2011

आपकी कविता पढकर ऐसा लग रहा है कि उस कागज के नाव पर बैठ कर हम सफरकर रहे है वाह कितनी सरल, परंतु सच्ची कविता बधाई http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2011/02/03/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%86%e0%a4%9c/

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    भगवानबाबू जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार, आशा है आगे भी आपको आनंद देने वाली रचनाएं प्रस्तुत कर पाऊंगा …

roshni के द्वारा
February 6, 2011

राजीव जी बहुत ही खूब कहा आपने.. दिल को छुने वाली कविता मैंने छोड़ दी एक नाव कागज़ की पानी में धीरे से | पहुंचे जो तुम तक तो जान लेना – खोज रहा हूँ मैं तुम्हें यहाँ .. best wishes

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    रोशनी जी, आभार आपका.

Tufail A. Siddequi के द्वारा
February 6, 2011

“…पर तुम न मिली मैंने कितना खोजा हर रोज़ तुम्हें …! आज शाम फिर नदी के किनारे मैं अकेला ही गया | धीमे धीमे शाम ढल गयी और मैं चुपचाप बैठा रहा |…” sundar rachna. mubarakbad.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    तुफैल जी, आभार . आपको भी शुभकामनाएं .

abodhbaalak के द्वारा
February 6, 2011

सुन्दर रचना दुबे जी आप काफी अच्छा लिखते हैं कान्टेस्ट के लिए मेरी शुभकामनाएं http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    अबोध जी, आपको मेरी रचनाएँ अच्छी लगीं यह जान कर आनंद हुआ…दरअसल यह मंच सुधी जनों से भरा है, पाठक और लेखक दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं और कई बार अपने रूप बदल बदल कर आते रहते हैं …

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 6, 2011

सुन्दर भावों से सजी इस सुन्दर रचना के लिए बधाई………….

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    पियूष जी, प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार.

rajkamal के द्वारा
February 5, 2011

प्रिय राजीव जी ..नमस्कार ! एक बेहतरीन उच्च कोटि की कविता पेश की है आपने **************************************************** अगर वोह नाव किसी और के पास पहुँच गई तो गज़ब नही ना हो जाएगा , अब पानी का क्या भरौसा किधर ले जाए ….

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    राजकमल जी, आपको कविता अच्छी लगी यह जन कर मन प्रसन्न हुआ. आभार . हाँ नदिया की धारा का तो सच में पता नहीं…, पर कहते हैं प्यार मुकाम तक पहुंचा देता है – एक डांवां डोल नाव में भी ….

nishamittal के द्वारा
February 5, 2011

भावपूर्ण कविता सच्चे प्रेम को प्रदर्शित करती.है.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    निशा जी, आभार .

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 5, 2011

विरह से व्याकुल और व्यथित हृदय की संवेदनाओं का सुन्दर सम्प्रेषण किया है आपने|शब्द नहीं है मेरे पास|

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    वाहिद जी, भाव यदि प्रतिबिम्ब बन कर उभर आयें पाठक के मन में तो कविता को जीवन मिल जाता है …आभार.

baijnathpandey के द्वारा
February 5, 2011

प्रिय राजीव जी, आपकी कविता छितिज के उसपर ले जाती है ………..एक और स्तरीय रचना के लिए बधाई

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    बैजनाथ जी, क्षितिज के उस पार आशा का संसार होता है….प्रतिक्रिया के लिए आभार .


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