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वह

Posted On: 4 Feb, 2011 में

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वह आज चुप बैठी रही
सुबह से – जब उसने दूध गर्म करने को चढाया |

 

दूध गर्म हुआ, उफान आया, और फ़ैल गया
वह न उठी |

 

छोटा बच्चा उसके पास आया – वह भूखा था
वह न उठी |

 

पति ने खाना माँगा
वह खड़ा रहा कुछ देर, और फिर चला गया |

 

बच्चा भूख से कुछ देर रोया, और फिर सो गया
सूरज धीरे-धीरे आसमान में चढ़ा और ढल गया |

 

पर वह यूं ही बैठी रही – चुपचाप
वह सोचती रही न जाने क्या – कहीं मानो उलझ गयी !

 

घर भी चुप है
दीवारें सहमी सी हैं |

 

शाम हो गयी है
बच्चा जग गया है और माँ के पास बैठा है |

 

पति लौट आया है
वह भी पास ही बैठा है |

 

सब इंतज़ार में हैं
की फिर बहने लगे प्यार का वह दरिया |

 

सब इंतज़ार में हैं
कि पिघल जाए वह ठहराव; और मिले मीठा अहसास सबको जिन्दगी का |

 

कि वह उठ जाए और चूल्हा फिर जले
फिर घर बोल उठे |

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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 5, 2011

कुछ अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गयी आपकी कविता| मर्म को छू लेने वाली कविता के लिए धन्यवाद,

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    हाँ वाहिद जी, प्रतिक्रया पर आभार.

deepak pandey के द्वारा
February 5, 2011

दिल को छू कर आई आपकी ये कविता. बधाई.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    दीपक जी, आपका बहुत बहुत आभार प्रतिक्रया देने के लिए. मैं भविष्य में भी अच्छी रचनाएं प्रस्तुत करने का प्रयास करता रहूँगा.

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 5, 2011

दुबे जी…. सुंदर रचना…. धन्यवाद

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    हिमांशु जी, धन्यवाद आपको भी प्रतिक्रिया के लिए…रचना पढ़ ली जाए तो ही लेखक कितना प्रसन्न हो जाता है फिर गुणी जन भी पढ़ कर पसंद करें तो कहना ही क्या…!

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 5, 2011

खूबसूरत भावों से भरी रचना ………. बधाई……..

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 5, 2011

खूबसूरत भावों से भरी रचना ………. बधाई……..

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    पीयूष जी, आपकी प्रतिक्रया के लिए ढेर सारा आभार.

priyasingh के द्वारा
February 4, 2011

बहुत ही सुन्दर शब्दों में लिखी कविता …………..दिल को छु लेने वाली रचना ……………. बधाई ………

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    प्रिया जी, इस कविता को लिखने के बाद मैं काफी देर तक चुप बैठा रहा – स्वयं … आपको भी अच्छी लगी यह जान मन में एक संतोष उभर आया .

baijnathpandey के द्वारा
February 4, 2011

बहुत हीं खुबसूरत रचना ………साधुवाद एवं शुभकामना

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    पाण्डेय जी, प्रतिक्रया के लिए आभार.

rajkamal के द्वारा
February 4, 2011

औरत लक्ष्मी है औरत ही माँ अन्नपूर्णा कही जाती है …. बहुत ही सुंदर कविता ….. बधाई सहित शुभकामनाये

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    जी, आप की बात सही है . प्रतिक्रया के लिए आभार .

roshni के द्वारा
February 4, 2011

राजीव जी बहुत अच्छा लिखा अपने मेरी और से शुभकामाए

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    रोशनी जी , धन्यवाद.


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