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नदी

Posted On: 4 Feb, 2011 में

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जाओ छोड़ो भी
अब न सुनुँगा मैं कुछ भी
क्यों पिछली बारिश में तुमने
मेरी सीमाओं को तोड़ा था …?

 

चंचल हो पर इसका यह मतलब तो नहीं
कि छोड़ दो तुम तटिनी कहलाना
मेघों को धरा से ही देखो
इस बार फिर भटक ना जाना।

 

ये बारिश है ही ऎसी
रोक न पाती मैं खुद को
जीवन का रस सुमधुर
हे तट मैं क्या करूं!

 

मैं नदी – प्यास बुझाती
पर फिर भी मैं जल की प्यासी
मत रूठो; लौट तो आती हूँ
इस बार दूर न जाऊंगी ॥

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dharmesh Tiwari के द्वारा
February 6, 2011

दुबे जी नमस्ते,भाई साहब बहुत खूब पेशगी है,धन्यवाद!

    rajeevdubey के द्वारा
    February 6, 2011

    धर्मेश जी, आपकी प्रतिक्रया के लिए आभार, अच्छा लगा इसे देखकर …|

nishamittal के द्वारा
February 5, 2011

दुबे जी आपकी कविता बहुत पसंद आयी.शुभकामनाएं.प्रेम का यह स्वरूप पर आपके बहुमूल्य विचारों की प्रतीक्षा है.

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    निशा जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार. मुझे यात्रायें अच्छी लगती हैं और दूर-दूर तक अपने कार्यवश जाता रहता हूँ…इसी कारण मंच पर कभी कभी प्रतिक्रियाओं को देने में देर हो जाती है. आप देखिएगा, मैंने अपने प्रतिक्रिया दर्ज करा दी है .

    rajeev dubey के द्वारा
    February 6, 2011

    आभार

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 5, 2011

“ये बारिश है ही ऎसी रोक न पाती मैं खुद को,” आपकी यह काव्य रचना बहुत पसंद आयी| आपकी रचनाओं की सदैव प्रतीक्षा रहती है| आभार सहित,

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    वाहिद जी, आपकी प्रतिक्रया की भी कम प्रतीक्षा नहीं रहती इधर, आभार.

R K KHURANA के द्वारा
February 5, 2011

प्रिय राजीव जी, ये बारिश है ही ऎसी रोक न पाती मैं खुद को जीवन का रस सुमधुर हे तट मैं क्या करूं! अच्छी कविता खुराना

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    खुराना जी , आभार. आपको रचना पसंद आई जान मन प्रसन्न हुआ ….

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 5, 2011

मैं नदी – प्यास बुझाती पर फिर भी मैं जल की प्यासी सुन्दर भावना से ओतप्रोत रचना…….. बधाई…….

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    पीयूष जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार.

Alka Gupta के द्वारा
February 4, 2011

ये बारिश है ही ऐसी……..! बहुत ही सुन्दर रचना !

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    अलका जी आपने कविता का सबसे दीप्त बिंदु पहिचान लिया. आभार .

rajkamal के द्वारा
February 4, 2011

प्रिय राजीव जी …नमस्कार ! आपकी कविता सुंदर बन पड़ी है …फिर भी आप अगर एडिट में जाकर नदी के दो कभी न मिलने वाले किनारों की व्यथा रूपी प्रेम पर भी अगर दो चार लाइने जोड़ दे तो सोने पे सुहागा …. बधाइयाँ एवम शुभकामनाये

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    राजकमल जी, सुझाव और सद्भावपूर्ण समीक्षा के लिए आभार.

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 4, 2011

राजिव जी….. सुंदर अभिव्यक्ति….. एक रचनात्मक काव्य….. आभार…..एवं शुभकामनायें….

    rajeev dubey के द्वारा
    February 5, 2011

    हिमांशु जी, कविता का रचनात्मक पक्ष पहचानने के लिए आभार .


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