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आज़ाद है - उजाड़ क्यों

Posted On: 22 Jan, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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रोकते गति तोड़ते मन फैलता विष हर ओर है ।
लूटते यह देश क्यों सुन रोष अब पुरजोर है ।

 

आज़ाद है उजाड़ क्यों यह देश आज जवाब दो ।
छीन ली सब रोशनी अब श्वेत पट भी त्याग दो ।

 

उठ जाए फिर लड़ जाए फिर देख जन घिर जागता ।
उठ गई कैसी आग है  यह   आज तू है  सोचता  ?

 

किसान फाँसी चढ़ता औ मज़दूर रोटी ढूँढ़ता ।
सत्ता में मदहोश है तू जन हित नित ही भूलता ।

 

धिक्कार है धिक्कार है यह सत्ता तो मक्कार है ।
फैला हुआ चहुँ ओर आज कितना भ्रष्टाचार है ।

 

जनसत्ता की जनहित की देखो उठती आवाज है ।
न रुकेगी न दबेगी  बढ़ती चलेगी  नाराज  है ।

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 2, 2011

उस सुन्दर और बहुचर्चित दिन की बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी भईया|

    rajeevdubey के द्वारा
    February 5, 2011

    हाँ वाहिद जी, मैं भी इसी जुगत में लगा हूँ. आभार.

Dharmesh Tiwari के द्वारा
January 24, 2011

राजीव जी आपने कविता के माध्यम से एक जबरदस्त प्रहार किया है आज की ब्यवस्था पर,देखतें हैं कब थमती है भ्रष्टता,धन्यवाद!

    rajeev dubey के द्वारा
    January 24, 2011

    धर्मेश जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. स्वयं न रुकेगी यह, पर हम रोकेंगे इसे लड़कर …

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 24, 2011

उठ जाए फिर लड़ जाए फिर देख जन घिर जागता । उठ गई कैसी आग है यह आज तू है सोचता ? इन पंक्तियों ने अंदर के मनुष्य को जागृत कर दिया राजीव भईया| यूँ ही लिखते रहें और हमें भी प्रेरित करते रहें देश के प्रति| कोटिशः धन्यवाद आपको, वाहिद काशीवासी

    rajeev dubey के द्वारा
    January 24, 2011

    वाहिद जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. आपका निवास दूर तो बहुत है पर किसी अज्ञात कारण से काफी प्रेम है आपके प्रति मन में . ऐसा लगता है जैसे अपने घर से किसी ने लिख भेजा हो … बीच में मनोज जी का फ़ोन आया था और चर्चा हुई. आप सबसे मिलने की इच्छा है. इश्वर ने चाहा तो जल्दी ही मिलेंगे भी.

rajni thakur के द्वारा
January 23, 2011

राजीव जी गरीब की पीठ पर बरसते महंगाई के कोड़े द्वन्द है किस बात की,अब तो चुप्पी तोड़े जन मन लाचार और सूबे का बुरा हाल है बेहतर भविष्य कैसे, वर्तमान ही बेहाल है

    rajeev dubey के द्वारा
    January 23, 2011

    रजनी जी, आप किस सूबे की बात कर रहीं हैं? वैसे तो कुछेक राज्यों को छोड़कर हर जगह समस्याएँ विकट ही हैं…काव्यात्मक प्रतिक्रया अच्छी लगी, धन्यवाद .

    RajniThakur के द्वारा
    January 24, 2011

    सवाल का जवाब आपने स्वयं ही दे दिया, गिने-चुनों को छोड़कर सभी का तो वही हाल है.

roshni के द्वारा
January 23, 2011

राजीव जी धिक्कार है धिक्कार है यह सत्ता तो मक्कार है । फैला हुआ चहुँ ओर आज कितना भ्रष्टाचार है यही है आज का सच बहुत बढ़िया रचना

    rajeevdubey के द्वारा
    January 23, 2011

    रोशनी जी, धन्यवाद. नवयुवाओं को यदि जगा सकूं तो फिर वह लोग ताकत लगा देंगे …देश के लिए… यह लड़ाई बड़ी है, …

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
January 23, 2011

कविता से जो असंतोष के भाव चालक रहे हैं, यही जन सामान्य के भाव हैं , सुन्दर कविता के लिए आभार

    Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
    January 23, 2011

    चालक := छलक

    rajeev dubey के द्वारा
    January 23, 2011

    शैलेश जी धन्यवाद. आपकी कविता सुबह ही पढी…प्रतिक्रया वहीं पर देखें…

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 23, 2011

किसान फाँसी चढ़ता औ मज़दूर रोटी ढूँढ़ता । सत्ता में मदहोश है तू जन हित नित ही भूलता । राजीव जी….. बड़े अफसोस की बात है महंगाई पर हर बार मध्यम वर्ग पर पड़ने वाले असर को हाई लाइट किया जाता है ….. कोई इस ओर ध्यान नहीं देता की आखिर निम्न वर्ग का क्या हाल होरहा होगा………… मध्यम वर्ग जिसमे सरकारी कर्मियों की बड़ी संख्या है…… उनको तो फिर भी महंगाई बढ्ने पर बढ़ा डीए तो मिलता है……. पर गरीब की मजदूरी महंगाई के साथ नहीं बढ़ती……….. आखिर निम्न वर्ग को जीने का अधिकार कब मिलेगा……..

    rajeev dubey के द्वारा
    January 23, 2011

    हाँ पीयूष जी, आपने मर्म पकड़ लिया . मैं जीवन में हर स्तर पर लोगों से संपर्क में रह कर घुल मिल कर बातें करता और जीता रहा हूँ. मैंने पैसे की कमी क्या होती है यह बड़े नज़दीक से महसूस किया है . मेहनतकश की आँखों में छलक आये आंसू मेरे ह्रदय में तूफ़ान और आँखों में बाढ़ लाते रहे हैं…जब सांझ रोटी न मिलाने की चिंता हो और घर पर बीमार बच्चा, बुजुर्ग या पत्नी हो तो जिन्दगी एक पहाड़ की चढ़ाई लगती है जिससे कई बार थक कर इंसान कूद भी जाता है… काश कि हम यह परिवर्तन की लड़ाए जल्दी ही जीतें … बहुत देर लग रही है ….!

rajkamal के द्वारा
January 23, 2011

प्रिय राजीव जी … सादर अभिवादन ! बहुत ही बेहतरीन कविता आप ही की तरह परिपक्व …. “सियासत है कोठे की इक तवायफ इशारा कोई करता है नजारा कोई करता है ( किसी और का है) जय हिंद

    rajeev dubey के द्वारा
    January 23, 2011

    राजकमल जी, आपको भी मेरा अभिवादन… काफी समय बाद एक छंदबद्ध रचना हुई … मानस में आपने युद्ध (लंका) काण्ड में (अन्यत्र भी ) छंद देखे होंगे… युद्ध के विवरण और भाव में यह बड़ा ही उत्तम छंद हरिगीतिका कहलाता है … ############################ दोहा ८० (ग) के पश्चात छंद देखें . ############################ क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं। मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं।। मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं। चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं।। धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं। प्रहलादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं।। धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही। जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही।। ########################################## तो चलिए यह युद्ध करते हैं… विचार से प्रारंभ करते हैं… श्री राम की जय हो! जय हिंद !

nishamittal के द्वारा
January 23, 2011

देश की वर्तमान अवस्था पर अच्छी रचना दुबे जी.

    Rajeev Dubey के द्वारा
    January 23, 2011

    निशा जी , प्रतिक्रिया के लिए आभार और नेताजी के जन्म दिवस पर जय हिंद !


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