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अतीत की प्रहरी

Posted On: 29 Dec, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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काल का शांत अविचल प्रवाह

सहसा विकलता क्यों उत्पन्न करने लगा !

हे देव ! जीवन, जो कि उन्मुख था सदैव शांति की ओर

क्यों निशा के अंधकार में भटकने लगा !

 

 

वे झंझावात जो चुपचाप चले जाते थे बिना छेड़े

क्यों अट्टहास कर आने लगे !

शांत सुखद निद्राओं को आकर अब

स्वप्न क्यों जगाने लगे !

 

 

खण्डहरों की पुरानी प्राचीरें जब यह पूछने लगीं

तो राह से गुजरते मेघ चुप न रह सके ।

वे बोल पड़े – तुम अतीत हो, सोती रहो

मत पूछो इन कठिन प्रश्नों के उत्तर ।

 

 

छायी रही कुछ देर नीरवता

फिर कुछ सोच मेघ बोले -

जब धरती के हृदय में तीव्र पीड़ा हो

तब कौन शांति से सो सकता है ?

 

 

 

जब वर्तमान हो धूमिल

तब गत वैभव की याद सताती है ।

सोती आत्माओं को हृदय की व्यथा

रो-रो कर बुलाती है ।

 

 

 

फिर देव भी तो सोते हैं अब

कितनी ही चीत्कारें उन्हें व्यर्थ ही बुलातीं – वे न आते ।

तुम अतीत हो – अपनी हो

धरती को तुम्हारी याद आती है ।

 

 

 

तुम शायद न जानती होगी –

मैंने देखा था कल रात्रि के अंधरे में ।

गंगा की धारा पुराना पाटलिपुत्र खोजती थी

न मिला तो ठहर सी गई – थम गया वेग उसका ।

 

 

 

सच कितना विषम काल है यह

न जाने कब उगेगा पूर्व में सूर्य वह !

जब उठ खड़े होंगे नए प्रहरी हर दिशा से   

भारत की धरती पर कर्मयोद्धा विजयघोष करते देखे जाएँगे।

 

 

 

तुम भी करो प्रार्थना रात्रि के अंधेरों में खड़ी

कि चमके आकाश में फिर राष्ट्र के सौभाग्य का सितारा ।

फिर सो सकोगी तुम शांति से –

ओ अतीत की प्रहरी !

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
December 31, 2010

प्रिय श्री राजीव दुबे जी, आपकी आवाज में कविता सुनना एक नया और अद्भुत अनुभव रहा । लगा आपके साथ ही बैठे आपके कविता पाठ का रसास्‍वादन कर रहे हैं । कविता तो सुंदर है ही। नव वर्ष की शुभकामनाएं । आगामी वर्ष अपने आगमन् के साथ आपके जीवन में खुशियों की बहार लाएं और सम्‍पूर्ण वर्ष आप व आपके परिवार के लिए मंगलकारी हो। अरविन्‍द पारीक

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
December 30, 2010

खूबसूरत रचना………. राजीव जी…….. इस रचना ओर नये वर्ष की हार्दिक बधाई……….

    rajeevdubey के द्वारा
    December 31, 2010

    आपको भी नव वर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएं !

    kmmishra के द्वारा
    December 31, 2010

    राजीव जी आपकी आवाज में कविता सुनना एक नया और सुंदर अनुभव रहा । लगा सामने ही बैठे आप कविता पाठ कर रहे हैं । जय हो ब्लागिंग की । एक देशभक्त की आवाज में देशभक्ति से ओतप्रोत कविता सुनने का एक अलग ही आनंद और प्रभाव है । जय भारत ।

    rajeevdubey के द्वारा
    December 31, 2010

    मिश्राजी, भीतर कहीं एक आग सुलग उठी है जो किसी तरह ठंडी नहीं होती, बाहर आ जाती है शब्द बन कर, इतनी मशालें जला देनी हैं जन जन के हाथों में कि भारत में छाया हुआ यह काला अन्धेरा मिट जाए …प्रेम और सहयोग बनाए रखिये

roshni के द्वारा
December 30, 2010

राजीव जी तुम भी करो प्रार्थना रात्रि के अंधेरों में खड़ी कि चमके आकाश में फिर राष्ट्र के सौभाग्य का सितारा हम भी इस प्रार्थना में शामिल है सुंदर प्रस्तुति

    rajeevdubey के द्वारा
    December 31, 2010

    विश्वास है कि हम प्रगति के पथ पर आगे बढ़ेंगे …

Deepak Sahu के द्वारा
December 30, 2010

राजीव जी क्या कविता है बधाई! दीपक http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com/

    rajeevdubey के द्वारा
    December 31, 2010

    आभार

वाहिद के द्वारा
December 30, 2010

अपनी संस्कृति से जोड़ते हुए अंतस में ज्वार लाती एक अत्यंत सुन्दर प्रस्तुति| साधुवाद राजीव जी|

    rajeevdubey के द्वारा
    December 31, 2010

    संदीप जी आभार.

Harish Bhatt के द्वारा
December 30, 2010

राजीव जी सादर प्रणाम, आपकी बहुत ही बेहतरीन कविता ने सोचने पर मजबूर कर दिया. बहुत-बहुत हार्दिक बधाई.

    rajeevdubey के द्वारा
    December 31, 2010

    हरीश जी विचारों में बड़ी शक्ति होती है … एक प्रयास है, उम्मीद है परिवर्तन की पुकार पर जन समर्थन मिलेगा …


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