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लड़ाई चलेगी लंबी इस बार, हमारी जीत तक ...

Posted On: 18 Dec, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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क्या करें, यह उजाड़ एक टीस बन कर उतर गया है अंदर 

देखी नहीं जाती यह बदहाली फिर भी मजबूर हैं हम अभी

ऐ वक्त तू दिखा ले, जो भी दिखाना हो तुझे

हम भी जिद्द पर हैं, लड़ाई चलेगी लंबी इस बार, हमारी जीत तक … ।

 

जो तुम सोचते हो कि यह देश है ठंडा अब न जागेगी चिंगारी कभी

जो तुम समझते हो कि यहाँ अब न रहे लड़ने वाले कोई

तो हम बता दें तुम्हें कि हमारी अच्छाई हमारी कमजोरी नहीं

लिए शोले हम घूमते हैं अब भी, आग जलेगी तुम्हें खाक में मिलाने तक … ।

 

ऐ वतन को लूटने वालों तुम खाते हमारा ही हो

ऐ वतन को तोड़ने वालों तुम्हारी साँसें हम चलने दें, तभी तक हैं

पर तुम्हें लगने लगा है कि तुम बन शासक हमें नेस्तनाबूत कर सकते हो

खड़े हो रहे हैं देखो नौजवां हमारे, लड़ने को, तुम्हारी सत्ता हटाने तक… ।

 

क्या सोच तुम आए थे कि हिन्द का खून पानी-पानी है

क्या तुम ने मान लिया कि अब यहाँ इस देश में न रहा कोई मानी है

बहुत कर ली तुमने मनमानी ऐ वतन के दुश्मन, बहुत वक्त गुज़र गया

हिन्द ने ठानी है इस बार करेंगे घमासान, तुम्हारा वजूद मिटाने तक … ।

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kmmishra के द्वारा
December 26, 2010

जो तुम सोचते हो कि यह देश है ठंडा अब न जागेगी चिंगारी कभी जो तुम समझते हो कि यहाँ अब न रहे लड़ने वाले कोई तो हम बता दें तुम्हें कि हमारी अच्छाई हमारी कमजोरी नहीं लिए शोले हम घूमते हैं अब भी, आग जलेगी तुम्हें खाक में मिलाने तक … । . कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥ पूरी कविता भारत के कर्णधारों को जगाने की शक्ति रखती है । आपकी कलम में माखन लाल चतुर्वेदी की आग है । पढ़ कर दिमाग सनसनाने लगता है । बहुत बहुत आभार ।

    rajeevdubey के द्वारा
    December 28, 2010

    आप सहयोग एवं प्रेम बनाए रखिये, अब बात बढ़ेगी और आन्दोलन बनेगी, मैं लगा हूँ अपनी ओर से, औरों को भी जोड़ रहा हूँ, जल्दी ही इलाहाबाद भी आऊँगा ….

HIMANSHU BHATT के द्वारा
December 20, 2010

जो तुम सोचते हो कि यह देश है ठंडा अब न जागेगी चिंगारी कभी जो तुम समझते हो कि यहाँ अब न रहे लड़ने वाले कोई तो हम बता दें तुम्हें कि हमारी अच्छाई हमारी कमजोरी नहीं लिए शोले हम घूमते हैं अब भी, आग जलेगी तुम्हें खाक में मिलाने तक … । भावपूर्ण रचना ….

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
December 18, 2010

क्या सोच तुम आए थे कि हिन्द का खून पानी-पानी है क्या तुम ने मान लिया कि अब यहाँ इस देश में न रहा कोई मानी है बहुत कर ली तुमने मनमानी ऐ वतन के दुश्मन, बहुत वक्त गुज़र गया हिन्द ने ठानी है इस बार करेंगे घमासान, तुम्हारा वजूद मिटाने तक … खूबसूरत प्रस्तुति राजीव जी………… बधाई……

Arunesh Mishra के द्वारा
December 18, 2010

बहुत खूब राजीव जी, हर एक लाइन में वो बात है जो भावनाओ को हिला के रख दे…बहुत खूब..

    rajeevdubey के द्वारा
    December 28, 2010

    अगर कदम भी बढ़ जाएँ तो मुझे और अच्छा लगेगा …

वाहिद के द्वारा
December 18, 2010

राजीव जी| वतनपरस्ती का यह जज़्बा अंदर छुपी हिंदुस्तानियत को झकझोर कर रख देता है| सलाम आपको|

    rajeevdubey के द्वारा
    December 28, 2010

    आइये इस हिन्दुस्तानियत को बाहार निकालते हैं, मैं बनारस के हर नुक्कड़ पर खड़े होकर यह और मेरी अन्य रचनाएँ सुनाने को तैयार हूँ, आप बताइये कब आऊँ ….?

NIKHIL PANDEY के द्वारा
December 18, 2010

राजीव जी …. आपकी ये ललकार उनतक जरुर पहुचेगी … डेट रहिये … विजय श्री तक ओजमय आवाहन

    rajeevdubey के द्वारा
    December 28, 2010

    निखिल जी, यह तो धनुष की टंकार भर है … आप जैसे युवा इसे तीरों में बदल सकते हैं …

nishamittal के द्वारा
December 18, 2010

ओजपूर्ण पंक्तियों के लिए बधाई दुबे जी.

    rajeevdubey के द्वारा
    December 28, 2010

    निशा जी धन्यवाद, सन्देश जन जन तक पहुंचाना है …


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