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कहो आज फिर वह संवाद…

Posted On: 16 Dec, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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कहो आज फिर वह संवाद
गूंजा था भारत में – सभ्यता का नाद |

 

इस हारे बेचारे जन-मन को
दो बता, अब आता फिर से सूर्योदय – बीत चली अब रात …|

 

ठहरा था जन टूटा था मन

स्वप्न हमारे चूर हुए हैं ।

 

पर हम भी भारत के जन हैं

नहीं अभी भी धूल हुए हैं ।

 

राम लड़े थे पैदल चल कर, जंगल-जंगल भटक-भटक कर

आता है हम को अब भी याद ।

 

देखो रात घनी ही होगी

मुश्किल देखो बड़ी ही होगी … ।

 

फिर भी रे जन लड़ना होगा

भारत के हित में चलना होगा ।

 

कहाँ हैं युवा, जोशीले अपने

कहाँ हैं लक्ष्मी बाई हमारी …?

 

आओ आगे, छोड़ो अब ये, जीवन-यापन के बहाने

देश माँगता, तुमसे जीवन, हाथ पसारे !

 

निकलो घर से, निकलो गाँवों से – शहरों से

आज फिर से आई पुकार… ।

 

ले हौसला बढ़ो आज फिर

राह देखता भारत का जन-मन

 

कहो आज फिर से वह संवाद
गूंजा था भारत में – सभ्यता का नाद |

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
December 18, 2010

देखो रात घनी ही होगी मुश्किल देखो बड़ी ही होगी … । फिर भी रे जन लड़ना होगा भारत के हित में चलना होगा । बेहतरीन प्रस्तुति ………… बधाई……..

kmmishra के द्वारा
December 17, 2010

कहो आज फिर से वह संवाद गूंजा था भारत में – सभ्यता का नाद | दुबे जी देश प्रेम से ओतप्रोत कविता के लिये आभार ।

roshni के द्वारा
December 17, 2010

राजीव जी, युवा वर्ग को देश प्रेम सिखाती ये कविता बहुत अच्छी लगी ….

allrounder के द्वारा
December 17, 2010

भाई राजीव जी युवाओं का देशहित मैं अहह्वान करती आपकी ये कविता देशप्रेम से ओत-प्रोत है, और दिल मैं एक चेतना जगाती नजर आती ! उत्तम अभिव्यक्ति के लिए बधाई !

वाहिद के द्वारा
December 17, 2010

राजीव भाई| देश की युवा पीढ़ी में जोशोख़रोश भरती इस सुन्दर कविता के लिए आपको सहर्ष धन्यवाद|

Amit Dehati के द्वारा
December 17, 2010

राजीव जी, बहुत ही सुन्दर कबिता, देश के नवजवानों को इस कविता के माध्यम से बहुत ही अच्छी साहस दी है आपने शुक्रिया ! http://amitdehati.jagranjunction.com

div81 के द्वारा
December 17, 2010

देश है पुकारता, पुकारती है माँ भारती खून से तिलक करो गोलियों से आरती बहुत सुन्दर पंक्तियों में आह्वान देश के लिए.

nishamittal के द्वारा
December 17, 2010

बहुत सुन्दर पंक्तियों में आह्वान देश के लिए.

December 16, 2010

कहो आज फिर से वह संवाद गूंजा था भारत में – सभ्यता का नाद…. राजीव जी कविता के माध्यम से बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति की है आपने.


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