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एक बुरे आदमी का आत्म-हत्या के पूर्व दिया गया वक्तव्य

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तुमने कभी नहीं मानी मेरी बात ।
मैंनें तुमसे कहा था कि
कह दो इन लोगों से – हंसना छोड़ने को
पर तुमने तो रोते हुए लोगों को भी हँसाने की योजनायें बनाईं ।

 

 

मैंनें कहा कि
तुम इन हवाओं को इतना मंद – मंद बहने से रोको
और कहो इनसे धूल उड़ाने को
जो लोगों की आंखों में भर जाये ।

 

 

पर आश्चर्य
तुमने तो आँधियों को भी
समझा बुझा कर
धीमे धीमे बहने को कहा ।

 

 

और मैंने चाहा था कि
तुम नदियों से कहो कि
वे बादलों की सहायता लें
और उफ़न कर तबाही मचायें ।

 

 

तब तुमने एक बार फिर
मेरी न मानी
और ज्यादा बादलों को
सूखे वाले इलाकों में भेज दिया ।

 

 

मैंने बच्चों की मासूमियत छीननी चाही
फूलों की खुशबु छीननी चाही
इंसानी रिश्तों को ख़त्म करना चाहा
धरती को बाँटना चाहा ।

 

 

और भी न जाने क्या क्या
अरमान थे मेरे
पर अफसोस
तुमने मेरा कभी भी साथ न दिया ।

 

 

इसलिये ऐ मेरी जिंदगी
में आज
तेरी सारी अच्छाई के साथ
तेरी  हत्या  कर रहा हूँ ।

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

baijnathpandey के द्वारा
February 5, 2011

प्रिय दुबे जी, आपने इस बात को रेखांकित किया है की इन्सान चाहे कितना भी बुरा हो …..स्वयं को कभी बुरा नहीं मानता ……….स्वयं को समझना हीं सबसे बड़ी अच्छाई है ……अच्छी रचना

kmmishra के द्वारा
December 26, 2010

दुबे जी को नमस्कार । खूबसूरत और दिल को छूती कविता । लेकिन क्या जिंदगी कभी मर सकती है ।

Dharmesh Tiwari के द्वारा
December 5, 2010

दुबे जी नमस्ते बेहतरीन शब्दों को लाईनों में पिरोती कविता बहुत कुछ बयां कर रही है,धन्यवाद!


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