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ओ गंगा !

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Ganga at Haridwar - Night

ओ गंगा ! तू जो कि रही है साक्षी
फैली हुई अनगिन समय धाराओं की
करती रही है विदा बूढ़ी होती सदियाँ
बता, मैं तेरे तटों पर कुछ पूछने आया हूँ ।

 

तेरी चपल धारा – श्वेत वस्त्र सी धरा पर…
तूने तो सुना होगा राम का नाम और कृष्ण का गान
तूने देखा भी होगा बुद्ध का दैदीप्यमान मुखमंडल
और सुना समेटा होगा निर्झर जो झरा मुख से ।

 

बता गंगे ! कैसा था ऋचाओं का नाद
यज्ञ कुण्ड की अग्नि जब धधकती थी तटों पर
क्या करते थे होम ऋषिगण
कैसा था पवन का वेग और कैसा था सूर्य का ताप ?

 

बता जब तेरे तटों के इस ओर से उस ओर
उतरतीं थीं सेनाएँ – होता था शंखनाद
गुजरते थे विजयी सम्राट करते उदघोष
क्या लक्ष्य लिए जाते थे सेनानी ?

 

नानक की वाणी और सूफी संदेश गुजरे थे तेरे तटों से
कबीर कह गए सब सार जो था तत्त्व का; सादगी से
सूरदास और तुलसी गुनगुना गए भक्ति भाव से
तेरे ही तटों पर नहा गए ईसा के प्यारे ।

 

गंगे ! क्या अब भी झरते हैं निर्झर
तेरे तटों पर क्या अब भी पवित्रता बसती है
बोल क्या पीड़ित आत्मायें नहीं आतीं
लिए चीत्कारें दूर निर्जनों में मिटाने को अग्नि ?

 

बता तू जो कि है कथा सार इस विस्तृत भूखंड की
हिमवान से सागर तटों तक करते नमन जन
न बह चुपचाप कर गर्जन बन विशाल
तू भी तो ऋणी है इस धरा की ।

 

 गंगे न बनके चल तू शव वाहिनी
तू सूना वे ऋचाएं रखीं तूने जो संजो
तू बहा निर्झर बुद्ध के स्वरों का
और सुना वे गीत करें जो रोमांच पैदा ।

 

देख सब देख रहे हैं तेरे तटों को
तू पावन सूना वे अमर गाथाएँ
कैसे बाँटता था बन मेघ हर्ष निधि अपनी
सुन सिंघनाद वीरों का भारती मुस्काती थी कैसे ।

 

बता कैसा था रंग बलिदानियों के रक्त का
कैसा था आमंत्रण मृत्यु को अमर सेनानी का
बता गंगे तेरे तटों पर क्या शपथें लेते थे वीर
क्या गुनगुनाते हुए वे प्रयाण कर जाते थे ?

 

गंगे बता इन जनों को
चेतनता तरंगित करती है कैसे
कैसे जागृति के प्रकाश तले
खड़े करतीं हैं सभ्यताएँ विजय स्तम्भ नए ।

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Wahid के द्वारा
December 6, 2010

राजीव जी! बेहद खू़बसूरत पंक्तियाँ… इनके माध्यम से आपने जो प्रश्न उठाये हैं और जो आग्रह किया है माँ गंगा से वह अद्भुत है| भूपेन हज़ारिका जी याद आ गए… ‘विस्तार है अपार, निःशब्द पुकार… ओ गंगा बहती हो क्यूँ…?? साधुवाद वाहिद http://kashiwasi.jagranjunction.com

    Rajeev Dubey के द्वारा
    December 7, 2010

    कहते हैं गंगा की मिट्टी में जीवन है … मैं प्रयाग में गंगा और यमुना के किनारे बैठ कहीं किसी पल जागृत हुआ तो वाणी और लेखनी में आशीर्वाद बह निकला, व्यक्ति का कुछ नहीं, सब समष्टि का है, निमित्त मात्र है व्यक्ति। आप के ऊपर भी एक दायित्व है, आइये मिल कर कदम बढ़ाएं, काशी पर लिखते रहिए, मेरी काशी की आगामी यात्रा में यदि आप वहाँ हुए तो जरूर मिलूंगा । निम्नलिखित ईमेल पते पर लिखें: RAJEEV.MAILBOX@GMAIL.COM

Dharmesh Tiwari के द्वारा
December 2, 2010

दुबे जी नमस्ते,बहुत ही सुन्दर प्रश्नों को जानने की कोशिश करती आपकी ये रचना,धन्यवाद!

    rajeev dubey के द्वारा
    December 2, 2010

    धर्मेश जी आभार .

AJAI KUMAR AGNIHOTRI के द्वारा
December 2, 2010

माँ गंगा के साथ जो कुछ भी हो रहा है उसका नुकसान आने वाली संतति अवश्य भुगतेगी. जैसे की माँ बाप की गलतियों का कुपरिणाम उनके बच्चो को भुगतना पड़ता है. हमारे निति नियंताओं की दुर्बुद्धि का कुफल हम सब और हमारी आने वाली पीढियां भुगतेंगी. जगह जगह नदियों पर बांध बनाकर उनका पानी रोक कर उनका प्राकृतिक बहाव विद्युत् उत्पादन के नाम पर रोक दिया गया है. क्या बिजली बनाने के और साधनों पर विचार नहीं किया जा सकता है. सौर उर्जा पर और अधिक अन्वेषण करने की आवश्यकता थी. जितना पैसा जल विद्युत् उत्पादन पर खर्च किया गया उससे भी आधे दामो पर सौर उर्जा की आदत डाल कर काम चल सकता है. आदमी की जैसी आदत डाली जाएगी वैसे ही वोह काम करना सीख जाता है. जैसे एक छोटा बच्चे को जो बातें सिखाई जाती है वही वह अपनाता है. हम कम वारिश की बात करते है पर उसके एक वृहद् कारण पर निगाह नहीं जाती. आपने बड़ी नदियों के जल को बाँध बनाकर रोक दिया. उनके जल का वाष्पन जो एक विशाल क्षेत्र में होता था और बादल बनाने में सहायक होता था वह केवल बांध वाले इलाकों में ही संभव होगा. हो सकता मैं गलत होऊं पर इस पर विचार अवश्य करना चाहिए की कहीं यही कारण तो नहीं.

    rajeev dubey के द्वारा
    December 2, 2010

    आप की बातें सत्य हैं, बिजली उत्पादन के वैकल्पिक स्रोतों पर अनुसंधान एवं क्रियान्वयन आवश्यक है . जल बिजली परियोज़नाएं यदि गंगा जैसी नदियों पर न लगाई जाएँ, और लगाई भी जाएँ तो पर्यावरण एवं लोगों की भावनाओं की सीमा में ही, तो ही उचित रहेगा .

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
December 2, 2010

प्रिय राजीव जी, भई बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में गंगा मां से इतिहास की जानकारी पुछती यह कविता। एक सुन्‍दर रचना के लिए बधाई। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

    rajeev dubey के द्वारा
    December 2, 2010

    दीपक जी धन्यवाद .


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