लोकतंत्र

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मैं भारत हूँ !

Posted On: 27 Nov, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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क्रांति की आवाज़ मानवीय संवेदनाओं पर होता नित निर्मम प्रहार,

सीधे चलता जन निर्बल माना जाता,

रौंदा जाता जनमत  प्रतिदिन…,

यह कैसा लोकतंत्र – यह कैसा शासन ?

 

 

 

सत्ता के आगारों में शासक चुप क्यों बैठा,

जनता हर रोज नए सवालों संग आती है -

क्या आक्रोश चाहिए इतना कि उठ जाये ज्वाला,

पिघलेगा पाषाण हृदय  तब भी , या तू चाहे विष का प्याला …?

 

 

वर्ष हजारों बिता-बिता कर,

सहज हुई जन चेतनता,

न उभरेगी तेरे सामने बन कर काल कठिन झंझानिल,  

ऐसी तेरी सोच बनी क्या ?

 

 

सौंपी बागडोर तुझको,

सदियों का विश्वास दिया …,

जन प्रतिनिधि बन क्यों है लूटता,

ऐसी क्या थी, जो पी ली तूने, सत्ता मद हाला ?

 

 

मैं भारत हूँ – जो लूँ अंगड़ाई तो हो जायें खड़े,

वे दीवाने फिर से लड़ने को,

उठे नया स्वातंत्र्य युद्ध फिर,

घमासान छिड़ जाये – मिट जाये, अस्तित्व तेरा ।

  

ध्वस्त कर दो संवेदनहीनता की दीवार ऐ शासक तू न कर भूल,

धिक्कार तेरा अंधत्व तुझे जो पीड़ा न  दिखती जन की,

द्वार तेरा फौलादी तो क्या…,

दीवार तेरी फिर भी ढह सकती, फौलाद तेरा फिर भी गल सकता  !

 

 

(यह कविता हाल ही में एक कवि सम्मेलन में प्रस्तुत करने पर पता चला कि देश की जनता परिवर्तन की प्रतीक्षा बड़ी ही बेसब्री से कर रही है … आइए कुछ सार्थक कदम मिल कर बढ़ाएं )

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

November 29, 2010

मैं भारत हूँ – जो लूँ अंगड़ाई तो हो जायें खड़े, वे दीवाने फिर से लड़ने को, उठे नया स्वातंत्र्य युद्ध फिर, घमासान छिड़ जाये – मिट जाये, अस्तित्व तेरा । राजीव जी, इस क्रांति की आवश्यकता महसूस होती है. बधाई.

kmmishra के द्वारा
November 29, 2010

मैं भारत हूँ – जो लूँ अंगड़ाई तो हो जायें खड़े, वे दीवाने फिर से लड़ने को, उठे नया स्वातंत्र्य युद्ध फिर, घमासान छिड़ जाये – मिट जाये, अस्तित्व तेरा । ऐ शासक तू न कर भूल, धिक्कार तेरा अंधत्व तुझे जो पीड़ा न दिखती जन की, द्वार तेरा फौलादी तो क्या…, दीवार तेरी फिर भी ढह सकती, फौलाद तेरा फिर भी गल सकता ! .दुबे जी सादर वंदेमातरम ! निसंदेह आप की कविताओं में देश की पीड़ा है और देश के लिये पीड़ा है । आपके अंदर मुझे श्रीकांत वर्मा दिखाई पड़ रहे हैं । इन कविताओं में बहुत शक्ति है । आभार ।

abodhbaalak के द्वारा
November 28, 2010

राजीव जी, प्रशंसनीय, आजके बहरे शासकों को जगाने की चेष्टा करती रचना, जो की आँख होते हुए भी अंधे और कान होते हुए भी ….. ऐसे ही लिखते रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 28, 2010

दुबे जी नमस्ते,शब्दों को लाईन में पिरो बेहतर प्रश्नों को पूछती व प्रहार करती लाईने,धन्यवाद!

NIKHIL PANDEY के द्वारा
November 28, 2010

हा आक्रोश चाहिए इतना कि उठ जाये ज्वाला,…… क्या बात है ..राजीव जी ऐसे ही तेवर चाहिए ..परिवर्तन के लिए …. और उसका शंखनाद लाखो युवाओं के इन विचारो से हो रहा है …..हम साथ है….

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 28, 2010

ऐ शासक तू न कर भूल, धिक्कार तेरा अंधत्व तुझे जो पीड़ा न दिखती जन की, द्वार तेरा फौलादी तो क्या…, दीवार तेरी फिर भी ढह सकती, फौलाद तेरा फिर भी गल सकता ! सुंदर पंक्तियाँ ………… बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई………..

jagojagobharat के द्वारा
November 27, 2010

सौंपी बागडोर तुझको, सदियों का विश्वास दिया …, जन प्रतिनिधि बन क्यों है लूटता, ऐसी क्या थी, जो पी ली तूने, सत्ता मद हाला ? सम सामायिक विषयो पर सटीक विश्लेषण है आप की कविता में .बहुत ही सुन्दर .


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