लोकतंत्र

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अहो परम पिता ! क्या करें हम ?

Posted On: 26 Nov, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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sheila dixitढह गई इमारत

दब गए – मर गए नाचीज़ लोग

झल्लाहट छा गई दिल्ली के दरबार में

उफ्फ,  ये गरीब, करते बरबाद गुलाबी सर्दी हमारी  !

 

 

कह दिया – धमका दिया जनता को  

और अगले ही दिन हो गए

बेघरबार हजारों

कुछ और ढह सकने वाली इमारतों से ।

 

Mashaal अब लेगें चैन की साँस

पीछा छूटा इन मुओं से

खुले आसमान के नीचे सोने वालों को

कोई इमारत देकर मुसीबतें क्यों बुलाएँ ?

 

 

जनता के पैसे से

जनता के वोटों से

खरीदी शालों को ओढ़

घूमता बेशर्म शासक ।

 

अहो परम पिता !

क्यों दे दी यह बेबस जिंदगी

कि हमारे हाथों की मेहनत से बनें उनके महल

और हमारी पगार इतनी कम ? 

 

क्या करें अब हम

उठा लें जलती मशालें 

और लगा दें आग इन रंगीन मिज़ाज लोगों को

बन जाएँ विद्रोही ?

 

या कि भर हुंकार

टूट पड़ें इन आदमखोरों पर

मिटा दें इनका अस्तित्व

पलट दें यह व्यवस्था ?

 

या फिर खड़े हो जाएँ इस बार

एक साथ

उठा दें आवाज़ इतनी

कि आसमान हो जाये मज़बूर !

 

बदल जाये अगली बार

मौसम, शासन, और ज़िंदगी

आ जाये हमारा अपना

संवेदनशील – लोकतंत्र !

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chaatak के द्वारा
November 27, 2010

पथराई आँखों के सपने सजा रही मीनारें, किसे फिकर है देखे इनमे, कितनी पड़ी दरारें, कितनी हसरत, कितने आंसू इनमे दबे पड़े हैं, होंठ सूखकर मूक हो गये, दिल में दबे शरारे ! स्नेही दुबे जी, आपकी कविता पढ़कर अनायास ही मुझे चाँद पंक्तियाँ स्मरण हो आईं| अच्छी कविता पर कोटिशः बधाई!

    rajeev dubey के द्वारा
    November 27, 2010

    सत्ता और व्यवस्था में कुछ को छोड़कर सब बेफिक्र हैं … पर हम साधारण जन जाग गए हैं … हम अपना काम कर दिखाएंगे । आइये लगे रहें …

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 27, 2010

नमस्ते दुबे जी,छोटी लेकिन अति सुशोभित लाईनों के जरिये गरीबों की आवाजों को सबके बिच रखने के लिए धन्यवाद!

    rajeev dubey के द्वारा
    November 27, 2010

    धर्मेश जी, आपको भी मेरा नमस्कार । गरीब की गरीबी इसलिए है क्योंकि उनका हक कोई छीन ले रहा है, व्यवस्था में खोट है, परिवर्तन की जरूरत है, आइये खड़े हों इस अन्याय के विरुद्ध ….

K M Mishra के द्वारा
November 27, 2010

या फिर खड़े हो जाएँ इस बार एक साथ उठा दें आवाज़ इतनी कि आसमान हो जाये मज़बूर ! बदल जाये अगली बार मौसम, शासन, और ज़िंदगी आ जाये हमारा अपना संवेदनशील – लोकतंत्र ! यह आवाज उन साठ करोड़ हिंदुस्तानियों की है जो दिनभर में 20 रूपया भी नहीं कमा पाते, बस निहारते रहते हैं ऊंची इमारतों को और सफारी, टोयटा, शेवरलेट में खिलखिलाते चाहरों को ।

    rajeevdubey के द्वारा
    November 27, 2010

    जी मिश्रा जी, सही लिखा आपने । चालाक, भ्रष्ट, एवं देशद्रोही लोगों ने व्यवस्था पर कब्जा कर रखा है । बस नाम मात्र के ही लोग होंगे शासन में जो ईमानदारी से देश के लिए सोचते हैं । हर ओर, किसी भी दिशा में निकल जाइए, गरीबी, भूख और बदहाली दिख ही जाती है । इतने दशक बीत गए और जनता-जनार्दन जिसने लाठियां खायीं और स्वतंत्रता आंदोलन को अपना खून दिया, वह अभी भी आश लगाए बैठा है … और यह शासक वर्ग अभी भी सुख सुविधाओं और सत्ता मद का भूखा है, हृदय विदीर्ण हो जाता है ….!

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 26, 2010

या फिर खड़े हो जाएँ इस बार एक साथ उठा दें आवाज़ इतनी कि आसमान हो जाये मज़बूर ! बढ़िया लेख के लिए बधाई………..

    rajeev dubey के द्वारा
    November 27, 2010

    पीयूष जी, आँखें भर आती हैं और कविता बन जातीं हैं … क्या करूँ, रहा नहीं जाता अपने देश की यह हालत देखकर, इसलिए लिख रहा हूँ, जहाँ जहाँ हो सकता हैं उन सभी माध्यमों पर आवाज उठा रहा हूँ, आप भी लगे रहिये, अब हम परिवर्तन लाकर ही रहेंगे …


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