लोकतंत्र

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rajeevdubey


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आओ मनाएं एक नयी दीपावली

Posted On: 21 Oct, 2014  
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Special Days कविता में

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इस चुनाव में…

Posted On: 4 Apr, 2014  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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इबादतगाह तक पीछा

Posted On: 4 Apr, 2014  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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सूरज खींच लाते हैं चलो

Posted On: 31 Oct, 2011  
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स्वर अभी भी गूंजते हैं…

Posted On: 13 Aug, 2011  
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जनविद्रोह जगा डाला…

Posted On: 14 Mar, 2011  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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उठ जाओ तुम (महिला दिवस पर विशेष प्रस्तुति)

Posted On: 8 Mar, 2011  
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मृत्यु

Posted On: 6 Mar, 2011  
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आदेश समझ लो !

Posted On: 27 Feb, 2011  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

31 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: rajeevdubey rajeevdubey

रचना जी, बड़े कठिन प्रश्न खड़े कर दिए आपने... मेरे विचार में हमारे राष्ट्रीय मानस पटल पर कुछ विकृतियाँ उभर आयी हैं. यह विकृतियाँ एक बहुत बड़े पुरुष वर्ग को उसकी शारीरिक ताकत के बल पर हिंसक, मौका परस्त और दूसरों के प्रति संवेदनहीन बना देती हैं. यह वर्ग हर दूसरे व्यक्ति को - चाहे वह पुरुष हो या स्त्री - दबाना चाहता है, कब्ज़ा करना चाहता है, भोगना चाहता है. कई बार कई स्त्रियाँ भी स्वयं इसी वर्ग की मानसिकता का हिस्सा बन इस कृत्य में शामिल हो जाती हैं. यह वर्ग लगातार सत्ता और धन पर कब्ज़ा करता जा रहा है , इत्यादि. यह वर्ग नियम क़ानून नहीं मानता, ... बिना किसी शर्म के... लगातार अपने से कमज़ोर का शोषण करता हुआ, अपने से कम पैसे वाले का, अपने से कम ताकत वाले का...! इस वर्ग की वजह से पूरा सामाजिक तंत्र एक असुरक्षा से त्रस्त है... और इस असुरक्षा से बचने के लिए अन्य सभी ने ढेरों सीमा रेखाएं खींच ली हैं, जिससे कि वह किसी तरह सुरक्षित जीवन यापन कर सकें, ढेरों रूढ़ियाँ पैदा हो गयी हैं... खुली हवा बंद है. और फिर यह सब कुछ और भी जटिल, पर्त दर पर्त बढ़ता गया है... यह समस्या का एक बड़ा पहलू है, जिस पर विचार कर समाधान खोजने की जरूरत है, निश्चय ही समस्या बड़ी है तो और भी ढेरों पहलू हैं... लेकिन फिर भी एक बात तय है, नारी को यह लड़ाई लड़नी होगी और वह सब पुरुष वर्ग जो इस देश और समाज को नष्ट होने से बचाना चाहते हैं, उन्हें समर्थन करना होगा ... । आप भी अपने विचार बताइएगा , आभार सहित.

के द्वारा:

के द्वारा:

मित्रों, इस कविता का एक भावार्थ लिखा था...इस दृष्टि से देखिएगा, शायद कुछ आनंद दे ... ..................................................................... चिड़िया उस उत्साही मन का प्रतीक है जो परिवर्तन चाहता है ... कुछ भला, कुछ नया...... इसे जीव भी मान सकते हैं । आकाश उस विशाल तत्व का प्रतीक है जो हमारे अन्तर्मन के रूप में हमसे बात करता है । बादल उस बुद्धि का प्रतीक है जो हमें राह दिखाती है, साथ देती, यह गुरु का भी प्रतीक है... जीवन की सदाशयता का प्रतीक है । और धरती उस सत्य का प्रतीक है जिसे प्रकृति या माया भी कहते हैं । चिड़िया का कुछ कर पाने पर सब भूल नीचे उतार जाना मोह का प्रतीक है... उसे उड़ते ही जाना था । जाल, इत्यादि संसार है । बहुत सारे पंछी इस बंधन में फंस चुके हैं... इसलिए धरती चुप रहती है...। शेष बिम्ब हैं और उनके विभिन्न घुले मिले अर्थ हैं...

के द्वारा:

के द्वारा: rajeevdubey rajeevdubey

कुछ पाठकों ने इस कविता के भावार्थ पर प्रकाश डालने का अनुरोध किया है...प्रस्तुत है: ............................................................................................................................... संसार में जीवन विपरीत ध्रुवों के बीच डोलता रहता है. भावनात्मक स्तर पर भी ऐसा ही होता है. मृत्यु शाश्वत सत्य है फिर भी हम जीवन सतत चाहते हैं...यही माया है ...इन्हीं सन्दर्भों में, यह रचना कुछेक प्रश्नों को उठाती है ...कि क्या सार्थक है, सागर की तरह मर्यादित रहना या कि नदी की तरह पानी के कम या ज्यादा होने पर अपना रूप बदल बदल कर दिखाते हुए मानों पूरी आतुरता के साथ जीवन जीना...यदि यह पता चल पाता तो स्वप्नों को संजो कर रखे हुए ह्रदय को बताया जा सकता कि इंतज़ार किया जाए...चुपचाप धैर्य के साथ, या, जी ली जाए जिन्दगी जो सामने है उसके साथ, पूरी शिद्दत के साथ ...! एक और तरीके से देखते हैं, दिन और रात के मिलन बिंदु का ही एक रूप सुबह है, तो दूसरा रूप सांझ है, परन्तु, सुबह जीवन की शुरुआत का प्रतीक है और सांझ अवसान का...लेकिन अवसान के बाद ही तो शुरुआत हो सकती है... एक नयी, शायद बेहतर...इसलिए किसी के विछोह पर क्या कह कर समझाऊँ किसी को ... आगे का भावार्थ शायद स्पष्ट होगा ... आप कहेंगे तो फिर और लिखूंगा...शुभेक्षा सहित.

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के द्वारा: kmmishra kmmishra

के द्वारा: rajeevdubey rajeevdubey

के द्वारा: rajeevdubey rajeevdubey

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के द्वारा: Nikhil Nikhil

राजकमल जी, आपको भी मेरा अभिवादन... काफी समय बाद एक छंदबद्ध रचना हुई ... मानस में आपने युद्ध (लंका) काण्ड में (अन्यत्र भी ) छंद देखे होंगे... युद्ध के विवरण और भाव में यह बड़ा ही उत्तम छंद हरिगीतिका कहलाता है ... ############################ दोहा ८० (ग) के पश्चात छंद देखें . ############################ क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं। मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं।। मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं। चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं।। धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं। प्रहलादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं।। धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही। जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही।। ########################################## तो चलिए यह युद्ध करते हैं... विचार से प्रारंभ करते हैं... श्री राम की जय हो! जय हिंद !

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के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा: rajeevdubey rajeevdubey

के द्वारा: rajeevdubey rajeevdubey

के द्वारा: rajeevdubey rajeevdubey

के द्वारा: rajeevdubey rajeevdubey

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माँ गंगा के साथ जो कुछ भी हो रहा है उसका नुकसान आने वाली संतति अवश्य भुगतेगी. जैसे की माँ बाप की गलतियों का कुपरिणाम उनके बच्चो को भुगतना पड़ता है. हमारे निति नियंताओं की दुर्बुद्धि का कुफल हम सब और हमारी आने वाली पीढियां भुगतेंगी. जगह जगह नदियों पर बांध बनाकर उनका पानी रोक कर उनका प्राकृतिक बहाव विद्युत् उत्पादन के नाम पर रोक दिया गया है. क्या बिजली बनाने के और साधनों पर विचार नहीं किया जा सकता है. सौर उर्जा पर और अधिक अन्वेषण करने की आवश्यकता थी. जितना पैसा जल विद्युत् उत्पादन पर खर्च किया गया उससे भी आधे दामो पर सौर उर्जा की आदत डाल कर काम चल सकता है. आदमी की जैसी आदत डाली जाएगी वैसे ही वोह काम करना सीख जाता है. जैसे एक छोटा बच्चे को जो बातें सिखाई जाती है वही वह अपनाता है. हम कम वारिश की बात करते है पर उसके एक वृहद् कारण पर निगाह नहीं जाती. आपने बड़ी नदियों के जल को बाँध बनाकर रोक दिया. उनके जल का वाष्पन जो एक विशाल क्षेत्र में होता था और बादल बनाने में सहायक होता था वह केवल बांध वाले इलाकों में ही संभव होगा. हो सकता मैं गलत होऊं पर इस पर विचार अवश्य करना चाहिए की कहीं यही कारण तो नहीं.

के द्वारा:

के द्वारा: priyasingh priyasingh

राजीव जी, सवालों का दायरा वाकई बढ़ रहा है बेचारे अपने बोले और रचे झूठ से बेनकाब होते मायनों (नेहरू कहाँ उचित होगा क्या?) के वंशज बिहार में अपनी पार्टी का तिया-पांचा किस तरह हज़म कर रहे होंगे इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है| बड़ी मोटी खाल वाले हैं ये आधे अँगरेज़ (इटालियन या क्षद्म पारसी भी जोड़ दें तो क्या हर्ज़ है)| सोनिया (एंटोनिया ठीक होगा क्या?) जब प्रधानमन्त्री बनने के नाम पर राष्ट्रपति भवन से अपना सा मुंह लेकर लौटी थीं तब उन्होंने त्याग का नाटक करके जनता को बहुत हद तक बेवक़ूफ़ बना लिया था लेकिन इस बार जनता शायद अपनी पिछली गलती दोहराने के लिए तैयार नहीं| बिहार चुनाव तो बानगी है| अच्छी पोस्ट पर बधाई!

के द्वारा: chaatak chaatak




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